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ब्राह्मणवाद के जुए को तोड़कर प्रेमचंद ने जिस समाज रचना की बात की थी, वह आज भी आवश्यक है

आज दिनांक 31/7/2019 को हिंदी- विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा तथा प्रेमचंद जयंती समारोह समिति के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारत के गांव का यथार्थ और प्रेमचंद का कथा- साहित्य’ विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। प्रेमचंद की तस्वीर पर पुष्पांजलि से प्रारंभ हुए इस कार्यक्रम में स्वागत भाषण के रूप में हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ चन्द्रभानु प्रसाद सिंह ने प्रेमचंद की जयंती के औचित्य पर प्रकाश डाला और बताया कि प्रेमचंद की रचनाओं से निकलती वैचारिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन दृष्टियाँ हमारे वर्तमान समय और संवेदना को गंभीरता से समझने में मददगार है। ब्राह्मणवाद के जुए को तोड़कर जिस तरह प्रेमचंद ने समाज रचना की बात की थी, वह आज भी हमारे लिए आवश्यक है। प्रेमचंद वस्तुतः ग्रामीण जीवन के यथार्थ को संवेदना के स्तर तक उतार कर लिखने वाले रचनाकार हैं, इसलिए उनका लेखन तिलिस्म तथा ऐय्यार की भावधाराओं को तोड़ता है और पहली बार केंद्र में किसान, मजदूर तथा निम्न वर्ग प्रतिष्ठित होते हैं।

विषय प्रवेश वरीय शोधप्रज्ञ शंकर कुमार ने किया और कहा कि प्रेमचंद की रचनाएँ अपनी तत्कालीन चेतना में जितनी भव्य और सामयिक है, उतना ही वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिक और उपयोगी भी। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में डाॅ शंभु शरण सिंह, क्षेत्रीय निदेशक, इग्नू, दरभंगा ने प्रेमचंद पर विस्तार से बातें की। उन्होंने बताया कि प्रेमचंद की रचना-प्रक्रिया में उनके जीवन का वह सहज और सरल तत्त्व महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है जिसके सहारे वे समाज के अंतरंग का परिचय प्राप्त करते हैं।उनका मानना था कि प्रेमचंद के पात्रों की जीवंतता वस्तुतः प्रेमचंद की उस संवेदनात्मक शक्ति से जुड़ी है, जिसे उन्होंने भारत के गांवों में भोगा है । उनके अनुभव से निकला यह द्रष्टा-भाव वास्तव में उनके साहित्य के युगीन संदर्भ को सर्वकालिकता में बदल देता है।

डॉ सिंह का विचार था कि प्रेमचंद ने ही सर्वप्रथम हिंदी कहानी में देशकाल- बोध को विश्वसनीय स्तर पर व्यक्त किया है। कार्यक्रम में अध्यक्ष के रूप में बोलते हुए इतिहास-विभाग के प्राध्यापक डॉ धर्मेंद्र कुंवर ने साहित्य को इतिहास का कच्चा माल बताया। लेकिन साथ ही यह भी कहा कि प्रेमचंद का साहित्य इतिहास को कच्चे माल के रूप में नहीं,बल्कि जीवंत इतिहास के रूप में प्राप्त होता है। उनका मानना था कि सुधारक के रूप से शुरू करके प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं के द्वारा समाज के विपन्न वर्ग को रेखांकित किया है।

इस अवसर पर इतिहास के विभागाध्यक्ष डॉ प्रभाष चंद्र मिश्र ने प्रेमचंद को याद किया और कहा कि गरीबों और गांवों की संवेदना की चर्चा प्रेमचंद के साहित्य में प्रमुखता से दिखती है। हिंदी- विभाग के सह-प्राचार्य डॉ सुरेंद्र प्रसाद सुमन ने जोर देकर कहा कि प्रेमचंद हमारे लिए स्मृति संदर्भ नहीं बल्कि जीवित प्रसंग हैं। प्रेमचंद जयंती समारोह समिति के उपाध्यक्ष हीरालाल साहनी का मानना था कि प्रेमचंद का साहित्य यथार्थवादी और मानवतावादी है। शोधप्रज्ञ ज्वालाचंद्र चौधरी ने प्रेमचंद की रचनाओं के वृद्ध- संदर्भ और स्त्री-संदर्भ को रेखांकित किया। मुजाहिद आलम ने प्रेमचंद के द्वारा सामाजिक आजादी को सुनिश्चित करने वाली बातों को अपने उद्बोधन में जगह दी और स्वप्ना कुमारी ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व की विराटता पर चर्चा की।

कार्यक्रम के प्रथम चरण में मुख्य अतिथि डॉ शंभु शरण सिंह को पाग-चादर से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन प्रेमचंद जयंती समारोह समिति के सचिव लाल कुमार ने किया जबकि हिंदी-विभाग के वरीय शोधप्रज्ञ हरिओम कुमार ने कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ एवं शोधप्रज्ञों की उपस्थिति रही।

दरभंगा से राकेश कुमार शाह की रिपोर्ट

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