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आप फ़ेमिनिस्ट या इंटेलेक्चुअल कुछ भी नहीं हैं, अगर किसी की मौत आपको करुणा से नहीं भर पाती

डेस्क: ज़रूरी नहीं कि जो मर गया उसका बढ़ा-चढ़ा कर गुणगान किया जाए लेकिन ये तो बिलकुल भी ज़रूरी नहीं कि, किसी की चिता की आग भी नहीं बुझी हो और आप उस शख़्स को कोसना शुरू कर दें। एक-एक करके उसकी ख़ामियाँ गिनवाने लग जाएँ।

देखिए कोई एक शख़्स चला जाता है मगर उसके पीछे उसके अपने रह जाते हैं। उन अपनों का दुःख आपके क्षोभ और ग़ुस्सा से कहीं बड़ा होता है। जो चला गया उसका नहीं सोचिए कोई बात नहीं, इतना तो ख़्याल रखिए कि उसके पीछे जो उसके अपने रह गये हैं उनके इमोशन तो कुछ दिन के लिए हर्ट न हों।

मैं मानती हूँ कि ‘सुषमा स्वराज’ आपके लिए आत्मविश्वास से भरी, आपके अकॉर्डिंग ‘फ़ेमिनिस्ट’ महिला नहीं थी। उन्होंने प्रेम वश अपने नाम के आगे अपने पति का नाम जोड़ा जो कि आपकी नज़रों में एक कमज़ोर औरत होने निशानी हो सकती है। जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है क्योंकि उनके पति ‘स्वराज’ ख़ुद ‘मिस्टर सुषमा स्वराज’ कहलाए जाने से ख़ुश ही होते थे। ये उन दोनों के आपस का प्रेम था।

फिर आप अगर आप ये सोच कर उनका विरोध कर रहें कि वो भाजपा में थी और भाजपा पैट्रिआरक्ल सोच वाली पार्टी है, तो ज़रा बताइए कांग्रेस कौन सी महिलाओं की हितैषी रही है। वहाँ तो बेटा जिसे राजनीति में दिलचस्पी नहीं है ज़बरदस्ती उसके हाथों में पार्टी की कमान सौंप दी गयी।

देखिए मैं आप बुद्धिजीवियों के विरोध को ग़लत नहीं ठहरा रही। आप लिखिए न उनके ख़िलाफ़, जितना भरास है सब निकालिए लेकिन ये वक़्त उपयुक्त नहीं है। सप्ताह भर का समय लीजिए फिर लिख डालिए एक पूरी किताब सुषमा स्वराज की ख़ामियों पर।

ऐसा तो है नहीं कि अगर सुषमा स्वराज के समर्थक उनका गुणगान कर रहे इससे आपका नुक़सान हो रहा और सुषमा जी कोई तमग़ा मिल जा रहा। आप बुद्धिजीवी हैं थोड़ा संयम आप ही बरत लीजिए क्या हो जाएगा।

वैसे सेम यही चीज़ मैंने ‘अटल बिहारी वाजपेयी जी’ के मृत्यु के बाद देखा था। एक तरफ़ उन्हें चाहने वाले अपना दुःख व्यक्त कर रहे थे तो दूसरी तरफ पूरी एक जमात उनकी कमियों का पिटारा खोल कर बैठ गयी थी।

अरे चाहे अटल जी रहें हो या सुषमा मैम आख़िर वो इंसान ही थे न। और कौन सा इंसान परफेक्ट होता है? क्या आप परफेक्ट हैं? आप ज्योतिबा बाई फूले और बाक़ी की स्त्रियों का उदाहरण दे कर सुषमा जी को लेस-फ़ेमिनिस्ट या आयरन लेडी कहे जाने का विरोध कर रही तो क्या आप जिनका उदाहरण दे रहें उनमें ख़ामियाँ नहीं रही होंगी? मानती हूँ कि सुषमा जी का ये कहना कि सोनिया जी को लेकर कि वो अपना सर मुंडवा लेंगी ग़लत था या फिर बलात्कार पीड़िता सोनी से मिलने से इंकार कर देना सही नहीं था। लेकिन सिर्फ़ कुछ वजहों को ध्यान में रख कर उनकी सभी अच्छाइयों को सिरे से नकार देना कितना उचित है? सोचिएगा।

और आख़िर में एक बात बुद्धिजीवी या फ़ेमिनिस्ट बनने से पहले ख़ुद के अंदर के इंसान को बचाने की कोशिश कीजिए। एक ऐसा इन्सान जिसे दूसरों के दुःख से दुःख और ख़ुशी से ख़ुशी महसूस हो सके। इतिहास सबका हिसाब करेगा आप खामखां ख़ुद का ख़ून जलाये जा रहें।

#Being_logical

आलेख Anu Roy जी के फेसबुक टाइमलाइन से 

डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं।इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। 

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