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मैं और बीबीसी-7: एक महिला पत्रकार की कहानी, जिसे BBC जैसे बड़े संस्थान में जातिगत प्रताड़ना का सामना करना पड़ा !

डेस्क: एक निर्धन दलित दिहाड़ी मजदूर की पुत्री Meena Kotwal अपने संघर्ष से पत्रकार बनी, उसने 2 साल बीबीसी में काम किया। उन्हें अब बीबीसी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है। संस्थान में काम करते हुए मिना ने जो अनुभव किया वो अपने फेसबुक टाइमलाइन पर लिख रहीं है। टीम ख़बरीलाल उनके अनुभव को अपने पोर्टल पर जगह देने का निर्णय लिया है। प्रस्तुत है उनके अनुभव का पार्ट-7…

मैं इतने तनाव में आ गई थी कि मेरा ऑफिस जाने का मन ही नहीं करता था. मन में हमेशा यही चलता रहता था कि मेरा एक्सीडेंट हो जाए, मुझे कुछ हो जाए… बस ऑफिस ना जाना पड़े.

जब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो इन सब के बारे में मैंने अपने संपादक मुकेश शर्मा, भारतीय भाषाओं की एडिटर रूपा झा और यहां तक कि रेडियो एडिटर राजेश जोशी को भी बताया. सबको लगा कि मुझे ही गलतफ़हमी हुई है, मैं ही जरूरत से ज्यादा सोच रही हूं. लेकिन वो दौर सिर्फ मैं जानती हूं कि मैं कैसे-कैसे उस भयावह स्थिति में थी. मेरे मन में इतना डर बैठ गया था कि कोई कुछ भी कहता तो मैं डर से सहम जाती. लगता कि कोई भी आएगा और मुझे डांट देगा.

मैं धीरे-धीरे डिप्रेशन में जाने लगी. एक बार जब मैं सुबह की शिफ्ट में थी तो आधे घंटे में ही मेरी तबियत इतनी खराब हो गई थी कि मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ गए. मुझे चक्कर आने लगे थे. ना बैठा जा रहा था, ना ही कोई काम किया जा रहा था. लेकिन मेरी इतनी हिम्मत नहीं हो पा रही थी कि मैं डेस्क पर जाकर बता दूं कि मेरी तबियत बिगड़ गयी है, क्योंकि मन में डर जो बैठा था कि कब कौन डांट दे या कुछ सुना दे. आख़िर में बहुत हिम्मत जुटा कर घर जाने की परमिशन ली. शायद थोड़ी देर और ना जाती तो मैं बेहोश होकर वहीं गिर जाती.

जुलाई, 2018 में मैंने एक सामान्य पोस्ट लिखी थी. लेकिन उसके बाद मुझे आईआईएमसी बकचोदी पेज ने ट्रोल किया और मेरे बारे में काफ़ी कुछ लिखा, जिसे पढ़कर साफ समझ आ रहा था कि बीबीसी के ही किसी व्यक्ति ने लिखा या लिखवाया होगा. कई लोग मुझे उल्टा-सीधा कहने लगे. मेरे ऊपर अब सोशल मीडिया पर भी सवाल उठाए जाने लगे थे, मुझे नाकारा साबित किया जाने लगा था. मेरी जाति को लेकर भी मुझे काफी कुछ कहा गया. (नीचे उस पोस्ट का स्किनशॉट है जिसके बाद मुझे आईआईएमसी बकचोदी पेज पर ट्रोल किया गया था)

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हां, मैं उन वज़हों से परेशान हो गई थी, शायद बहुत ज्यादा परेशान. कोई किसी के बारे में ऐसे कैसे लिख सकता है. ये बातें मेरे दिमाग मे लगातार चल रही थी. मन बेचैन होने लगा था. रात को ये सब सोच ही रही थी कि इतने में राजेश प्रियदर्शी सर का मैसेज आया, जिसमें लिखा था, “इंटरनेट के जमाने में कोई दलित नहीं होता.” मुझे कुछ समझ ही नहीं आया. इतने में उनका दूसरा मैसेज भी आया, जिसमें उन्होंने बीबीसी के एक पूर्व पत्रकार का नंबर दिया और कहा कि “इनसे बात करो ये भी दलित हैं. बीबीसी में पहले काम करते थे और अब डॉयचे वेले, जर्मनी में हैं.”

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वे मुझे ये सब क्यों कह रहे हैं. फिर समझ आया कि शायद सर ये कहना चाहते थे कि वो भी दलित हैं. लेकिन उन्होंने (शायद) यहां कभी वो सब महसूस नहीं किया जो मैंने किया है. लेकिन ये तो जरूरी नहीं कि सबका अनुभव एक जैसा हो. मैंने उन्हें फोन ना करने का फैसला किया, यहां तक कि मैंने उनका नंबर भी सेव नहीं किया और ना कभी बात करने के बारे में सोचा.

रह-रहकर बस दिमाग में यही बात आ रही थी कि सर ने ऐसा क्यों कहा कि इंटरनेट के जमाने में कोई दलित नहीं होता… अगर ये सच है तो इंटरनेट के जमाने में ही हम दलितों पर हो रहे अत्याचार, उत्पीड़न की खबरें क्यों करते हैं? क्यों उनके बारे में खुद वे अक्सर लिखते रहते हैं? क्यों दलितों को आज भी सम्मान नहीं मिल पा रहा? क्यों उन्हें हर चीज़ के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है? क्यों उनके नाम पर राजनीति हो रही है… आख़िर क्यों…?

चिंता-निराशा और बढ़ गई और ये सब मैंने फिर से अपने संपादकों को बताया. बार-बार बताने से भी कुछ नहीं हो रहा था. ना ऑफिस के हालात सुधर रहे थे और ना मुझे सम्मान मिल रहा था. मैं ऑफिस में दोहरी जंग लड़ रही थी. एक सम्मान की तो दूसरी मीडिया में अपनी जगह बनाने की, कुछ अच्छा काम करने की.

काफ़ी जद्दोजहद के बाद कुछ स्टोरी करने को मिली और मैंने पूरी ईमानदारी के साथ उनपर काम भी किया. कुछ स्टोरी ने बहुत अच्छा परफॉर्म किया, कई बार तो वो उस दिन और हफ्ते की सबसे ज्यादा चलने वाली स्टोरी में भी शामिल हुई. मुझे लगा कि अब तो कोई मेरे लिए दो शब्द जरूर कहेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. दूसरों की स्टोरी अगर थोड़ा भी अच्छा परफॉर्म करती तो उनके लिए व्हाट्सएप ग्रुप पर भी तारीफ़ होती, ऑफिस में भी और मीटिंग में तो भर-भर के तारीफ़ों के साथ तालियां भी बजाई जाती. लेकिन मेरे लिए कभी किसी मीटिंग में या कहीं कोई तारीफ़ नहीं हुई.

इसी बीच मैं एक स्टोरी करना चाहती थी. ऑफिस में मेरी बारह बजे से शिफ्ट थी लेकिन स्टोरी सुबह की मीटिंग में पहुंचानी होती है और मैंने अपनी सहयोगी को वो बता दी थी, जिसे मीटिंग में मेरी तरफ से आइडिया बताना था. उस स्टोरी आइडिया को सुनते ही राजेश प्रियदर्शी सर कहते हैं कि “with due respect she is not well equipped to do these kind of stories.”

हो सकता था वो स्टोरी नहीं की जा सकती हो या उसे करने का कोई अलग तरीका हो. वो बात आसानी से कही जा सकती थी कि हमें इस तरह की स्टोरी करनी चाहिए या नहीं करनी चाहिए या इसे ऐसे-वैसे करनी चाहिए. लेकिन सभी लोगों के बीच, मेरी गैर-मौजूदगी में मुझे नाकारा और अयोग्य ठहरा दिया गया जैसे मैं कुछ करने लायक ही नहीं हूँ.

To be continued…इससे आगे की कहानी अगले लेख में

Desk
Social Activist
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