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दलितों के साथ हजारों सालों से चली आ रही दमन और शो’षण का चक्रव्यूह खत्म हो जाएगा तो सवर्णों को पूछेगा कौन?

डेस्क: यह किसी दलित की लाश नहीं है, बल्कि इस समाज की अर्थी है। तमिलनाडु के वेल्लोर जिले में दलित की लाश को इसलिए कथित सवर्ण लोगों ने अपने खेतों से नहीं जाने दिया क्योंकि शायद उनकी जमीन ‘अपवित्र’ हो जाती। हजारों सालों से चले आ रहे इस दमन और शोषण की नीति पर कहीं कोई बहस नहीं, मीडिया में कोई स्पेस नहीं। क्यों? क्योंकि शोषण भी आपका, मीडिया भी आपकी, जनता भी आप, फैसला भी आपका, अदालत भी आपकी, अवार्ड भी आपको, महान लोग भी आपके लेकिन शोषित और वॉइसलेस… हम!

कहीं लिं’चिंग का जश्न मनता है, कही किसी खास जाति के लोगों को गाली दी जाती है, आरक्षण की दुहाई दी जाती है, क्यों? क्योंकि आपको तो लगता है आरक्षण गरीबी के आधार पर मिलना चाहिए लेकिन शोषण, गाली , मजाक और मौत तो जाति के नाम पर है, गरीबी के आधार पर नहीं। आप डरते हैं कि हजारों सालों से चली आ रही दमन और शोषण का चक्रव्यूह जब खत्म हो जाएगा तो फिर आपको पूछेगा कौन?

दलित कार्ड खेल रहे हैं हम! क्योंकि 21वीं सदी में छुआछूत, भेदभाव जैसा तो कुछ होता ही नहीं, लेकिन ये घटना भी 21वीं सदी की ही है और ऐसी ही कई घटनाएं आए दिन देखने को मिलती हैं वो भी 21वीं सदी में ही हो रही हैं।

दलितों, मु’स्लिमों और महिलाओं को इस 21वीं सदी में ही अपने लिए जगह बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। रोजाना रे’प, लिं’चिंग, बहुजनों के शोषण की खबरें आप पढ़ते तो हैं, उन्हें किसी पेपर में खबर का एक कोना भी शायद मिल जाता है, लेकिन आपको विचलित नहीं कर पाती, क्यों? क्योंकि वो तो आपके लिए आम ख़बर से ज्यादा कुछ नहीं है! इनसे जुड़ी घटनाओं का आपने सामान्यीकरण कर दिया है। आपकी किताबों, कविताओं, विमर्श में ना हम कभी थे और ना ही हैं।

खैर, सोचिये यह भी कि जब कथित सवर्ण एक दलित के शव को अपने यहां से निकलने नहीं देता है तो अपने साथ बैठाकर काम करते कैसे देख सकता है? ये जाति है साहेब जो आसानी से जाती नहीं है।

युवा जर्नलिस्ट  Meena Kotwal के फेसबुक टाइमलाइन से 

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Social Activist
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