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राष्ट्रीय एकीकरण हमें सबल कर राष्ट्र से जोड़ता है: प्रो. एस के सिंह

दरभंगा: राष्ट्रीय एकीकरण हमें यह सिखाता है कि पहले हम हिन्दुस्तानी है फिर बिहारी-बंगाली या हिंदू-मुसलमान। यह हमें भावनात्मक रूप से सबल कर राष्ट्र से जोड़ता है और बताता है कि राष्ट्र सर्वोपरी है। इतिहास के अलग-अलग कालखंडों में एकीकरण की प्रक्रिया के तरीके अलग-अलग रहे हैं। उक्त बातें लनामि विवि के कुलपति प्रो. सुरेन्द्र कुमार सिंह ने ‘‘समकालीन भारत में राष्ट्रीय एकीकरण’’ विषयक सेमिनार को संबोधित करते हुए कही। प्रो. सिंह ने कहा कि राष्ट्रीय एकता और एकीकरण एक दूसरे के पूरक है पर इनमें भिन्नता भी पायी जाती है। एकीकरण की शुरूआत अगर परिवार से की जाय और बाल्यावस्था को केन्द्रित कर एक राष्ट्र की अवधारणा से बच्चों को शिक्षित किया जाय तो राष्ट्रीय एकता अखंडित रहेगी। जैसा नागरिक होगा वैसा ही देश बनेगा। एक भाव रहेगा तो देश भी एक रहेगा।

स्वयंसेवी संस्था डाॅ प्रभात दास फाउण्डेशन एवं लनामि विवि के समाजशास्त्र विभाग व कामेश्वर चेयर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए कुलसचिव कर्नल निशिथ कुमार राय ने कहा कि भारत को जोड़ने में महिलाओं की अहम भूमिका रही है और सामयिक भारत के एकीकरण में इसका पूर्णतः ध्यान रखा जा रहा है। राष्ट्रीय एकीकरण का जीता-जागता उदाहरण भारतीय सेना है जो सर्वधर्म में विश्वास करती है। सेना जिस तरह से होली, दीपावली मनाती है उसी तरह से ईद और नानक जयंती मनाकर राष्ट्रीय एकता का संदेश देती है। लोगों को हर धर्म, जाति का सम्मान करना सीखना होगा, तभी राष्ट्रीय एकीकरण का सफल स्वरूप धरातल पर उतर सकता है। सेमिनार के मुख्य वक्ता राजनीतिक चिंतक डाॅ जितेन्द्र नारायण ने गूढ़ता पूर्वक विषय वस्तु की व्याख्या करते हुए बतलाया कि आजादी के बाद सरदार पटेल जो कार्य एकीकरण के दौरान नहीं कर पाये थे, समकालीन भारत में उसी को अमलीजामा पहनाया जा रहा है। अगर सरदार पटेल की राहों में रोड़ा ना अटकाया गया होता तो एकीकरण का कार्य कबका पूरा हो गया होता। यहां वीरों की कमी नहीं रही है पर इगो दिखाने और नेतागिरी चमकाने के चक्कर में सरदार के अभियान को पलीता लगाया गया जिसके कारण कई राजे-राजवाड़ों का भारत में विलय तो हो गया पर उनका पूर्ण एकीकरण नहीं हो पाया। इसलिए समकालीन भारत में एकीकरण की प्रक्रिया फिर से महसूस हुई और धारा 370 व 35‘ए’ को हटाकर इसका आगाज किया गया है। जम्मू-कश्मीर को अस्थायी रूप से विशेष दर्जा देते हुए सरदार पटेल ने कहा था कि जो मूल्क अस्थायी प्रावधान से निपट नहीं सकता है उस मूल्क को जिन्दा रहने का हक नहीं है। भारत ने सत्तर सालों तक इस अस्थायी प्रावधान से निपट कर यह दिखला दिया कि हिन्दूस्तान जिन्दा है। डाॅ नारायण ने कहा कि राष्ट्र हमारा है इसी सूत्र को प्रतिपादित करता है राष्ट्रीय एकीकरण। ऐसा बोध देश के समस्त नागरिकों में अनिवार्यतः होना चाहिए। प्राचीन काल से ही हमारी संस्कृति में एकीकरण का ऐसा स्वरूप समाया रहा है कि विदेश भी इसमें समाहित होकर यहां के नागरिक बन गये। समाजशास्त्री डाॅ गोपीरमण प्रसाद ने कहा कि वर्तमान में राष्ट्रीय एकीकरण प्रासंगिक बन चुका है इसलिए हमारी पीढ़ी की यह जिम्मेवारी बनती है कि उन कारको की तलाश करें जिससे कि यह प्रक्रिया देश में सफल हो सके। हमें मिल-जुलकर जीवन जीने की क्षमता विकसित करनी होगी तभी राष्ट्रीय एकीकरण सफल हो सकता है। डाॅ विद्यानाथ मिश्र ने कहा कि वर्तमान भारत का नक्शा प्राचीन भारत से बिल्कुल अलग है। हमें अलग-अलग कालखंडों में जाति, धर्म आदि के नाम पर कई बार तोड़ा गया पर राष्ट्रीय एकता के बल पर आज भी भारत बुलंदी से खड़ा है। राष्ट्रीय एकीकरण से ही भारत में राष्ट्रीय एकता विकसित हुई है। कश्मीर समस्या की जड़ धारा 370 हटने के बाद एकीकरण की राह आसान हो गयी है। सेमिनार की अध्यक्षता करते हुए समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष डाॅ बिनोद कुमार चैधरी ने कहा कि देश जिस दौर से गुजर रहा है उसमें राष्ट्रीय एकीकरण जरूरी है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक अपना देश है। हम जाति, धर्म, वर्ग आदि का भेद नहीं करते हैं इसलिए धारा 370 हटने के बाद सफलता से राष्ट्रीय एकीकरण का ध्येय पूरा होता दिख रहा है। एकीकरण के मार्ग में कुछ बाधाएं भी है, जिनपर नागरिक एकता की बदौलत विजय प्राप्त की जा सकती है। सेमिनार में अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन डाॅ मंजू झा ने दिया। जबकि संचालन प्रो. शंकर कुमार लाल ने किया तथा स्वागत फाउण्डेशन के सचिव मुकेश कुमार झा ने किया। इससे पूर्व कार्यक्रम का प्रारंभ दीप प्रज्जवलित कर अतिथियों ने किया। मौके पर प्रो अरूणिमा सिन्हा, डाॅ प्रतिभा गुप्ता, डाॅ चंद्रभानू प्रसाद सिंह, सारिका पाण्डेय, डाॅ एनके अग्रवाल, लक्ष्मी कुमारी, पूजा, स्नेहा, ज्योति, साधना, फाउण्डेशन के अनिल कुमार सिंह, राजकुमार गणेशन, नवीन झा, मनीष आनंद, मोहन साह, अशेश्वर ठाकुर, मनोज बैठा आदि मौजूद थे।

राकेश कुमार शाह की रिपोर्ट

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