आभासी दुनिया देश

हम ये कब मानेंगे कि पीरियड्स एक सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया है, इसमें गंदा या अपवित्र जैसा कुछ नहीं होता ?

जाने कितनी लड़ाइयाँ बाक़ी है. कितनी जिंदगियाँ जानी है. ये सेकंड-सेक्स होना अपने आप में एक अंतहीन-व्यथा है.

लड़कियाँ चाहे भारत में हो केन्या में सहना उन्हीं को पड़ रहा. पिरीयड पर इतनी बातें हो रहीं. कितना कुछ लिखा और फ़िल्मों में दिखाया जा रहा मगर इसको ले कर नॉर्मल न जाने हम कब होंगे. कब मानेंगे कि ये सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया है. इसमें गंदा या अपवित्र जैसा कुछ नहीं होता.

ख़बर केन्या से आयी है मगर मुझे बिहार का वो सरकारी स्कूलस याद आ रहा जहाँ पिरीयड शुरू होते लड़कियाँ लगभग स्कूल आना बंद कर देती हैं. उन्हें डर लगता है कि उनके कपड़ों में जो दाग़ लग जाएगा तो लोग क्या कहेंगे? लड़के मज़ाक़ उड़ाएँगे. टीचर भी प्यार से समझाने के बदले कहेंगी कि,
“आज आयी क्यों! अब चार दिन के बाद आना!”

पहली बार पिरीयड होना किसी ट्रॉमा से कम नहीं होता. ख़ास कर बच्चियाँ जब घर के बाहर हो. (वैसे तो घर में भी माएँ कहाँ बताती हैं. यहाँ उन माँओं का ज़िक्र हो रहा जो निचले तबके या अशिक्षित हैं.) कोई उनको बताने या समझाने वाला नहीं होता. स्कूल में सेक्स एजुकेशन कंपल्शरी हो और साथ ही साथ पाँचवीं कक्षा से ही पिरीयड के बारे में लड़के और लड़कियों दोनों को ही बताया जाया. पिरीयड के लिए जितना लड़कियों का जानना ज़रूरी है उतना ही लड़कों का. उन्हें भी पता होना चाहिए कि ये प्राकृतिक प्रक्रिया है. इससे हर महीने लड़कियों को गुज़रना होता है. साथ ही साथ उन्हें ये भी बताया जाए कि बजाय मज़ाक़ उड़ा कर लड़कियों को अनकम्फ़र्टबल करने के उनके दर्द को समझ कर उनकी सहायता करें. जब तक स्कूल में ऐसे और इतनी गहराई से खुल कर बातें नहीं होंगी, न तो समाज बदलेगा और न देश और न दुनिया. और एक बात शुरूआत कहीं से तो करनी होगी न तो अपने-अपने घरों से करने की कोशिश कीजिए. घर में जो कामवाली आती है. उससे बात कीजिए. उनको समझाइए. ये समाज कि वो इकाई है जहाँ आबादी तो बहुत है मगर जानकारी न के बराबर.

आख़िर में एक आख़िरी बात दुर्गा पूजा बस चंद दिन दूर है तो ‘कन्यापूजन’ में कन्या को बजाय चूड़ी-झूमके देने के उन्हें ‘सनैटरी पैड’ दें. हो सके तो उन से बात भी करें. ये ख़ूबसूरत आग़ाज़ होगा!

#Being_logical

 

आलेख अनु रॉय जी के फेसबुक टाइम लाइन से

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