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JNU प्रकरण : शिक्षा के अधिकार पर बहस हो, बकचोदी नहीं !

जे॰एन॰यू॰- कितना ज़ेन्यून ?

1019.38 एकड़ में फैला हुआ दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय फिर से चर्चा में है, वैसे साल का ऐसा ही कोई महीना गया होगा पिछले पाँच सालो में,जब ये विश्वविद्यालय चर्चाओं में नहीं आया हो ।

पिछले पाँच सालो में JNU की छवि, जनमानस में बहुत बदली है, किसी जमाने में इंटेलेक्टचुअल और शोधकर्ताओं के गढ़ के लिए मशहूर ये विश्वविद्यालय, अब ग़लत कारणो के लिए मशहूर है और हो रहा है, जिसमें कुछ तथ्य भी है और बहुत ज़्यादा अफ़वाह भी।

फ़ीस वृद्धि को लेकर जिस तरह से JNU के छात्र प्रोटेस्ट कर रहे है, वो अद्भुत है लेकिन इसके पीछे बहुत से सवाल है जिसपर बात नहीं हो रही है और एक धड़ा ये भी सोच रहा है कि ये प्रोटेस्ट कही ना कही उन बहसों को दबाने की साज़िश भी हो सकती है।

पिछले पाँच सालो में JNU के बारे में बहुत सी बाते सामने आयी है, दूसरों को सहिष्णुता और संविधान का पाठ पढ़ाने वाले JNU के छात्रों का दोयम रवैया भी सामने आया लेकिन उसपर सार्थक बहस नहीं हो पायी, या कहे जब होनी शुरू हुई, वो किसी प्रोटेस्ट की बलि चढ़ गयी।

JNU पिछले पाँच सालो में

JNU में सबकुछ ठीक था लेकिन कन्हैया और उमर ख़ालिद प्रकरण के सामने आने के बाद बहुत सी चीज़ें बदलनी शुरू हो गयी, ये बात सच है कि उस प्रकरण ने कन्हैया को बहुत लोकप्रियता दी ये बात भी सत्य है कि उसी प्रकरण ने पहली बार JNU को प्राइम टाइम के स्लॉट में लाकर कुछ हफ़्तों तक खड़ा कर दिया और जिसके बाद से JNU की छवि बहुत हद तक डेंटेड हो गयी या कहे कर दी गयी।

मीडिया ने अपने हिसाब से चीज़ों को दिखाया और कभी भी एक सार्थक बहस नहीं की, जिसके परिणामस्वरूप उसके बाद के कॉरेस्पॉंडिंग इन्सिडेंट और प्रोटेस्ट को लोग प्रोटेस्ट के नज़रिए देखने में दिक्कत होने लगी।

एक विश्वविद्यालय का एक बहुत बड़ा धड़ा सिर्फ़ इस बात के लिए रामदेव का कार्यक्रम रद्द करवाने की माँग करता है क्यूँकि वो किसी आयडीआलॉजी को फ़ॉलो करता है, क्या सहिष्णु का ब्रेक डाँस करने वाले JNU के छात्रों के पास इतना धैर्य नहीं है कि वो अपनी आयडीआलॉजी के विपरीत कुछ सुन सके?

सुब्रमनियम स्वामी से लेकर विवेकानंद की मूर्ति तोड़ने तक, इस विश्वविद्यालय ने अपनी छवि खुद ही इतनी धूमिल कर ली है कि इसके आंदोलोनो को उतनी से गम्भीरता से लेना अब मुश्किल हो रहा है जितना पहले लिया जाता था।

हाल के प्रोटेस्ट में आंदोलनकारी छात्रों का रवैया जैसा रहा Zee news की महिला पत्रकार के साथ, वो भी काफ़ी दुखद है और ये और दुखद हो जाता है जब आप इसकी माफ़ी नहीं माँगते और इसको ग्लोरिफ़ाई करते है सोशल मीडिया पर।

अकडेमिक्स के मामले में अभी भी JNU का कोई सानी नहीं है और ये बात हर साल आ रही विश्वविद्यालयों के रैंकिंग से साबित हो रही है ।

भारत सरकार की NIRF रैंकिंग में ये विश्वविद्यालय दूसरे नम्बर पर है और NAAC ने JNU को A++ ग्रेड श्रेणी में रखा है ।

आज इसी NAAC ने पटना विश्वविद्यालय की रैंकिंग घटा कर C कर दी है जिसपर कोई हो हल्ला नहीं हो रहा है क्यूँकि जिस विश्वविद्यालय की रैंकिंग ही C है वहाँ के छात्रों का मनोबल और मनोविज्ञान जानने के लिए आपको इसरो जाने की ज़रूरत नहीं है।

बिहार के छात्र कुछ दिन पहले गमछे के लिए एक आंदोलन खड़ा कर दिए थे, शिक्षा के लिए आजतक ऐसा नहीं कर पाए, हर बार रविश कुमार आपकी मदद नहीं कर सकते।

JNU में फ़ीस वृद्धि और सख़्त नियमवाली

19 साल से JNU में फ़ीस नहीं बढी है , फ़ीस बढ़ने की प्रक्रिया को सतत बनाना होगा नहीं तो ऐसे बवाल होते रहेंगे। दिल्ली मेट्रो का किराया भी ऐसे ही बढ़ाया गया था जिसपर खूब बवाल हुआ लेकिन बाद में सब ठीक हो गया, JNU में पढ़ने वाले और दिल्ली मेट्रो में रोज़ सफ़र करने वाले अलग अलग लोग है , इसलिए JNU का प्रोटेस्ट इतनी आसानी से ख़त्म नहीं होगा, सरकार ये बात समझती है और इसलिए शुरू से ही आक्रामक है, लेकिन सबको सबकुछ दिख रहा है , लाठी ऐसे नहीं भाजी जाती है छात्रों पर, बिना सरकार के आदेश के इस तरह से जानवरो की तरह पीटना वो भी छात्रों को, सम्भव नहीं है।

मुद्दा सिर्फ़ JNU में हो रही फ़ीस वृद्धि का नहीं है, देश के अलग अलग राज्यों में भी फ़ीस वृद्धि का विरोध हो रहा , कोलकाता से लेकर देहरादून, हर जगह प्रदर्शन हो रहे है लेकिन जैसे बेबी को बेस पसंद है, मीडिया को JNU पसंद है, कारण TRP का TRP और प्रोपोगैंडा का प्रोपोगैंडा ।

इस मामले में सरकार ने आंशिक रूप से कुछ बदलाव किए लेकिन JNU वालों ने इसको ऐक्सेप्ट नहीं किया, उनको पुरानी फ़ीस स्ट्रक्चर ही चाहिए जो कि एक ग़ैर वाजिफ सवाल है।

१९ साल से आप एक ही फ़ीस देकर सभी सुविधावो का लाभ नहीं उठा सकते है, सरकार के पास भी लिमिटेड संसाधन है और उसको और भी विश्वविद्यालय भी देखने है, JNU एक मात्र विश्वविद्यालय नहीं है देश में।

लेकिन सवाल ये भी है कि क्या ये विरोध फ़ीस बढ़ोतरी के लिए ही हो रही है या इसके पीछे कोई और बाद भी है? JNU में हॉस्टल को लेकर बहुत सी खबरें आती रहती है, कॉलेज प्रशासन ने कुछ समय पहले हॉस्टल के नियम सख़्त कर दिए है जिससे छात्र नाराज़ है, उनका मानना है कि वो कब आए और कब जाए ये उनका अधिकार होना चाइए लेकिन जब वो ये बोलते है तो वो भूल जाते है वो एक विश्वविद्यालय के हॉस्टल में रहते है जिसका को एक पर्सेंट किराया भी अपनी जेब से नहीं दे रहे है और विश्वविद्यालय के होस्टल के कुछ नियम क़ायदे है, उसका पालन करना अनुशासन होता है, अधिकारो का हनन नहीं।

२०१२-१३ में JNU द्वारा जारी की गयी एक फ़ैक्ट शीट के अनुसार JNU में एक बच्चे की पढ़ाई पर औसतन साल में 233,194 खर्च करती है, इसके बदले सरकार बीस फ़ीसद भी नहीं है लेती है JNU छात्रों से ।

फिर भी मेरा ये मानना है कि सरकार को छात्रों से बात करनी चाहिए और वहाँ पढ़ रहे छात्रों का फ़ायनैन्शल बैक्ग्राउंड चेक करवाना चाहिए और जो BPL या EWS हो उनको आर्थिक सहायता देकर, बढ़ी हुई फ़ीस को लागू कर देना चाइए।

शिक्षा सस्ती होनी चाइए, सबको मिलनी चाइए, जिसके पास संसाधन नहीं है उसको संसाधन उपलब्ध करवाकर शिक्षा देनी चाहिए लेकिन जिसके पास संसाधन है उसको ३०० रुपय का हॉस्टल चार्ज और १०००० रुपय का मेस चार्ज लेने में कोई दिक्कत नहीं है क्यूँकि जब आइफ़ोन फ़्लॉंट करके ३०० के लिए रोते है तो दोगले लगते है।

देश में शिक्षा की व्यवस्था

देश की शिक्षा व्यवस्था का पता बस इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्ल्ड टैलेंट रैंकिंग में हम नीचे से पाँचवे नम्बर पर है, ६३ देशों में भारत का स्थान ५९वाँ है, हमसे आगे चाइना, दक्षिण अफ़्रीका और रुस जैसे देश है ।

पूरे भारत में सिर्फ़ दिल्ली ही ऐसा राज्य है जिसमें शिक्षा और उसके स्तर को लेकर बहस हो रही है और चुनाव में इसको मुद्दा बनाया जा रहा है, बाँकि किसी भी राज्य में ऐसी स्थिति पैदा नहीं हुई है जो कि शर्मनाक है लेकिन लोगों का, उनके लिए अभी पहली प्राथमिकता राम मंदिर है, फिर सिवल कोड और तीसरा तीन तलाक़।

इस देश में बहस का स्तर इतने नीचे आ गया है कि लोग सही और ग़लत मुद्दे में फ़र्क़ करना भूल गए है, आप कोई भी न्यूज़ चैनल या वेब्सायट देख ले, हर जगह जाति और धर्म का मामला उछाला जा रहा है, BHU में एक मुस्लिम प्रफ़ेसर को संस्कृत पढ़ाने से रोक दिया गया है, कुतर्क दिया जा रहा है कि ऐसा रहा तो कल को मुल्ले लोग मंदिरो में पूजा कराना शुरू कर देंगे, और दुर्भाग्य ये है कि बहुत से लोग इसका समर्थन भी कर रहे है, वैसे लोगों के लिए शिक्षा कोई मुद्दा है ही नहीं, और ऐसे लोगों को इन प्रोटेस्टो से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता और सरकार को लोकतंत्र में ऐसे ही लोग तो चाहिये होते है।

आख़िर में जौन एलिया का एक शेर उन तमाम साथियों के लिए जो अपने हक़ के लिए लड़ रहे है :

“एक ही हादसा तो है और वो ये कि आज तक
बात नहीं कही गई बात नहीं सुनी गई “

शिक्षा के अधिकार पर बहस हो, बकचोदी नहीं

आलेख एवं फोटो Dhairyakant Mishra जी के पेज हैशटैग लहरिया से

Desk
Social Activist
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