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क्या बाबा नागार्जुन विवाद पर मैथिलों का ‘गुँह गीजना’ जायज है ?

फ़र्ज़ी मैथिलो को बिख़ पादते हुए जब देखता हूँ तो मन करता है कि इनका धोती खोल के इनको दरभंगा हवाईअड्डे पर ले जाऊँ और पोन पर दो दांत काट लू और फिर इसके ऊपर से प्लेन को उड़वा दूँ ।

मैं मैथिलो को बिना रीढ़ और बिना दिमाग़ का होमोसेपियंस मानता हूँ , इसके दस कारण है , बताऊँगा एक भी नहीं ।

इनके अंदर का अहंकार , जातिवाद और सूपरमेसी का बोध इतना बड़ा है कि इसके आगे इनको कुछ नहीं दिखता है , ये लोग इतने पागल और बेकार है क्या ही बोलूँ ? इसलिये जब कोई मैथिल मिथिला के इतिहास पर इतराता है तो मन करता है मुँह में छी छी कर दूँ ।

पचास साल से मिथिला राज्य के लिये लड़ रहे थे , ढंग का मिथिला चौराहा भी नहीं बना पाये , राज्य से अब ये हवाईअड्डे पर आ गये , फिर थूक चाट कर अब AIIMS का नाड़ा पकड़े हुए है , इनको मिलेगा कुछ नहीं , फिर भी हम छी मैथिल ,हम छी विद्यापति के नाती और हम छी सीता के जनमभूमि से , बस इतने में ही इनका मिथिला मैथिल ख़त्म ।

दुनिया जब सीधे गेयर में काम करती है , मैथिल रिवर्स गेयर में काम करते है , ये अपनी भाषा को आज तक ऐकडेमिक में नहीं शामिल करवा पाये लेकिन इसके साहित्य को चचरी मचान पर रख कर इस बात का दम्भ ज़रूर भरते है कि ये मैथिली भाषा को रिवाइव कर रहे है , मैथिल लोग भी इसी में ख़ुश रहते है ।

एक ऐसा साहित्य , जिसकी ख़ुद की लिपि है ,उसको देवनागरी में लिखकर और फिर उसको बेच कर अगर ये लोग मैथिली के विकास का दम्भ भरते है तो मैं संदास करता हूँ ऐसे अहंकार पर ।

मैथिलो को इस बात का ग़ुस्सा है कि पिछले दो तीन दशक में साहित्य और कला में इनका ढंग का कोई रेप्रेज़ेंटटिव नहीं है , ना ढंग का सिनेमा बना पाये और ना ढंग की किताब लिख पाये और ना ढंग की कोई चीज़ इंवेंट कर पाये , किया क्या इन्होंने ?

इन्होंने बस CP ठाकुर के धोती में फ़ॉल लगाया है और उसके धोती के छेद में अपना जीभ का लार्वा लगा लगा कर दिल्ली के बुरारी संगम विहार में विद्यापति समारोह में नाचा है , पाग और मखाना पहन कर ।

मैंने इतनी भूमिका क्यूँ बनायी ?

एक महिला ने आरोप लगाया है कि जब वो सात साल की थी तब बैद्यनाथ मिश्रा (नागार्जुन) जो मिथिला के बड़े साहित्यकार हुए है , उन्होंने 81 वर्ष की आयु में उनका यौन शोषण किया था ।

चूँकि मैथिलो के पास गिने चुने लोग ही है , और उसमें से भी किसी पर ऐसा आरोप लग जाना और ऊपर से आरोप लगाने वाली कोई महिला हो , मैथिलो की धोती ढीली होनी ही थी । मैं तर्क पढ़ रहा हूँ और सिर पीट रहा हूँ , ऐसा लग रहा है जैसे पहली बार किसी महिला ने किसी साहित्यकार पर ऐसे आरोप लगाये हो ।

समस्या है हम साहित्यकारो की एक ऐसी आदर्श इमेज बना लेते है जिसके इतर हमको कुछ दिखता नहीं , जिस लड़की ने आरोप लगाया है वो अपने माँ बाप के साथ नागार्जुन के सामने रहती थी , उसने आरोप लगाया है लेकिन जो लोग नागार्जुन को डिफ़ेंड कर रहे है उन्होंने बस उनकी किताबें पढ़ी है और उसके आधार पर वो उस लड़की को क्या से क्या नहीं बोल चुके है ।

कोई उसको वामपंथी कह रहा है , कोई उसको प्रगतिशील होने का तमग़ा लगाकर ये साबित कर रहा है कि ये सब बहुत नोर्मल है ।

ये समस्या सिर्फ़ मैथिलो में नहीं है , ये समस्या मर्द ज़ात में ही है , वो तब तक यौन शोषण को गम्भीर नहीं मानते जब तक लड़की को जला ना दिया हो , उसके जननांग को चीड़ के पेड़ पर लटकाया ना गया हो या उसको मार के कुत्तों से नोचवाया नहीं हो ।

इसके कमतर कुछ हुआ हो तो वो शक लड़की पर ही करेंगे , सवाल उसी से ही पूछेंगे , क्यूँकि उसके आराध्य देव पर किसी ने आरोप लगा दिया है ।

किसी ने लिखा है कि 81 साल का बीमार आदमी एक सात साल की बच्ची के साथ ऐसा नहीं कर सकता है , लेकिन कोई ये नहीं सोच रहा कि अगर ऐसा हुआ है तो उसको ये बात बताने में और हिम्मत जुटाने में 28 साल क्यूँ लग गये ? हम ऐसा समाज क्यूँ नहीं बना पाये ?

बचपन में लड़कों के साथ भी यौन शोषण की घटना होती है , मेरे साथ भी हुई है लेकिन मै इतनी हिम्मत आज तक नहीं जुटा पाया कि मैं ये बात अपने दोस्तों को बता सकूँ , मैंने बहुत कम देखा है किसी मर्द को इसपर बात करते हुए , इसलिये हम चाहते है कि इसपर कोई बात भी ना करे और कोई करने की हिम्मत करे तो उसको कुतर्को से इतना परेशान कर दे कि वो पागल होकर ग़ायब हो जाये।

नागार्जुन पर लगे आरोप से मुझे कोई शॉक नहीं लगा है , मैं कला के आधार पर कलाकार की इमेज नहीं बनाता , अगर बनाता तो माइकल जैक्सन से इतनी नफ़रत कभी नहीं करता ।

बाँकि इन फ़र्ज़ी मैथिलो का गुँह गीजना लिखा है , वो गीजेंगे ही …

आलेख: हैशटैग लहरिया नाम के फेसबुक पेज से

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