देश बिहार राजनीती राज्य

प्रमोशन में आरक्षण: बीजेपी के लिए दलित-पिछड़े और आदिवासी हिंदू नहीं है क्या ?

डेस्क: प्रमोशन में आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला एक बार फिर से सियासी बवाल खड़ा होता दिख रहा है। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियां इसको लेकर केंद्र सरकार पर हमलावर है। इसके साथ-साथ एनडीए सरकार में शामिल एलजेपी और जेडीयू जैसी पार्टियां भी सरकार से सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने की मांग कर रही हैं।

वहीं बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव केंद्र की एनडीए सरकार पर जोरदार हमला बोला है। पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है,

“BJP और NDA सरकारें आरक्षण ख़त्म करने पर क्यों तुली हुई है? उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने आरक्षण ख़त्म करने लिए सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ा। कल माननीय सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है। इसे लागू करना या नहीं करना सरकारों पर निर्भर करता है।’

आरक्षण प्राप्त करने वाले दलित-पिछड़े और आदिवासी हिंदू नहीं है क्या? BJP इन बहुसंख्यक वंचित हिंदुओं का आरक्षण क्यों छिनना चाहती है? हम केंद्र की एनडीए सरकार को चुनौती देते है कि तुरंत सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के ख़िलाफ़ पुनर्विचार याचिका दायर करे या फिर आरक्षण को मूल अधिकार बनाने के लिए मौजूदा संसद सत्र में संविधान में संशोधन करे। अगर ऐसा नहीं होगा तो सड़क से लेकर संसद तक संग्राम होगा।

आरक्षण संवैधानिक प्रावधान है। अगर संविधान के प्रावधानों को लागू करने में ही किंतु-परंतु होगा तो यह देश कैसे चलेगा? साथ ही आरक्षण समाप्त करने में भाजपा का पुरज़ोर समर्थन कर रहे आदरणीय रामबिलास पासवान जी, नीतीश कुमार जी, अठावले जी, अनुप्रिया पटेल भी इसपर अपना स्पष्ट मंतव्य जारी करे।”

Image result for tejashwi yadav

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया जिसमें राज्य सरकार से कहा गया था कि वह प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए आंकड़े जुटाए। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से यह पता करने को कहा था कि एससी-एसटी कैटिगरी के लोगों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व है या नहीं, जिससे प्रमोशन में रिजर्वेशन दिया जा सके। मामला जब सुप्रीम कोर्ट में गया तो उसने कहा कि राज्य सरकार को आरक्षण देने का निर्देश जारी नहीं किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकार प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा है कि प्रमोशन में आरक्षण ‘मौलिक अधिकार’ के दायरे में नहीं आता है।