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बड़ा सवाल: मनुस्मृति में सिर्फ चार वर्णों का उल्लेख है, तो संविधान में एक हजार से अधिक जाति-उपजातियां कहां से दर्ज है ?

डेस्क: दरभंगा, 19 फरवरी: मिथिला भूमि में शोध की प्राचीन परंपरा रही है और इसलिए यह धरती ज्ञानियों की धरा कहलाती है। जनक के दरबार में अष्टावक्र-आचार्य बंदी का संवाद हो या फिर याज्ञवल्क-गार्गी का शास्त्रार्थ। सब में शोध के सूत्र निहित है। हमारे यहां आत्मिक प्रेम को महत्व दिया गया है। हमारी संस्कृति अद्वितीय है, पश्चिम से तो बिल्कुल अलग है। इसलिए यहां होने वाले शोध को यहीं की दृष्टि से देखा जाना चाहिए, न कि पश्चिम के चश्मे से। शोध की पद्धति के साथ दृष्टि भी जागृत होनी चाहिए। तभी शोध संभव हो सकता है। उपरोक्त बातें सामाजिक चिंतक एवं प्रज्ञा प्रवाह के उत्तर भारत के संयोजक रामाशीष ने भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसन्धान परिषद् द्वारा संपोषित‘‘ सामाजिक विज्ञान में शोध पद्धति’’ विषयक कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा।

उन्होंने बताया कि भारत को जातियों में बांटने का श्रेय मनु को दिया जाता है, परंतु हमारे संविधान में एक हजार से अधिक जाति-उपजातियां दर्ज है। इसे किसने बताया है? यह शोध का विषय है। ऐसे अनेक विषय है जिनपर शोध होने से भारत को लाभ होगा। शोधार्थियों को चाहिए कि प्रासंगिक और लाभप्रद विषय पर शोध करें। अपने आप को जानने वाले ही शोध कर सकता है। गांव-शहर, लोगों के बीच जाकर अध्ययन करने से ही शोध की सार्थकता नजर आती है। बिना जनता के बीच गये और अनुभव प्राप्त किये शोध नहीं कर सकते है। विशेष कर आंकड़ों का निर्धारण तो कतई नहीं किया जा सकता है। प्राचीन मिथिला में ऐसे ही शोध हुए हैं और इसी से यहां के ज्ञानियों ने भारत के पुरूषार्थ को विश्वभर में स्थापित किया है।

सामाजिक चिंतक रामाशीष ने कहा कि विचार की प्रक्रिया स्थिर नहीं होनी चाहिए। यदि विचार स्थिर होता है तो विकास बाधित हो जायेगा। पूरे इतिहास को पाश्चात्य के लोगों ने भारत के सामने तोड़-मरोड़ कर रख दिया और हम पीढ़ी दर पीढ़ी पाश्चात्य लेखन को ही पढ़ते रहें और तरजीह देते रहें। यही कारण हुआ कि आज जो लोग मनु को पढ़ें नहीं पर मनु पर अनरगल टिप्पणीयां करते नजर आते हैं। जबतक हम पाश्चात्य के चश्में से भारत को देखते रहेंगे, हम अपने स्वर्णिम इतिहास को ढ़कते रहेंगे। मनु ने अपने लेखनी में भारत में वर्ण व्यवस्था को लिखा है और यह शोध का विषय है कि संविधान में इतने जातियों का उल्लेख कैसे हो गया? और इस सारे का ठिकरा मनु पर फोड़ा गया। भारत को भारत की दृष्टिकोण से जानने की जरूरत है। भारतवर्ष के अंदर अपनी परंपरागत पद्धति को फिर से लागू करनी चाहिए। प्रजातंत्र विश्व में सबसे पहले भारत में ही था, इसका जीता-जागता उदाहरण लिच्छवी गणराज्य है। हम चाणक्य की जगह अरस्तु, प्लेटो आदि को पढ़ते हैं जबकि चाणक्य, जो तक्षशीला के राजनीति शास्त्र के आचार्य थे, ने यह साबित कर दिया कि प्रतिभा की पहचान कैसे की जाती है, इसका जीता-जागता उदाहरण चंद्रगुप्त मौर्य हैं। पाश्चात्य इतिहासकारों ने अपने सम्राट सिकंदर की प्रतिष्ठा को बचाने के लिए करई के मैदान में पुरू को सिकंदर द्वारा बंदी बनाने का अनरगल इतिहास रच दिया।

भारत सरकार के पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान ने कहा कि शोध के विभिन्न आयामों पर चर्चा आज बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने कहा कि शोध हो और बोध ही नहीं हो वैसे शोध की क्या जरूरत है। उन्होंने नए-नए बोध के लिए शोध को आवश्यक बताया। श्री पासवान ने कहा कि हर स्तर पर और हर विद्या में शोध आवश्यक है इसीलिए शोध को सरल, सुगम और सुलभ बनाना जरूरी है। शोधार्थियों का आह्वान करते हुए श्री पासवान ने कहा कि शोध हमेशा निष्पक्ष भाव से करें। सच्चाई को शब्दों में डालना, बेकार को आकार देना और व्यवधान का समाधान भी शोध है। श्री पासवान ने कहा कि शोधार्थियों में जिज्ञासा पैदा कीजिए और उनके मौन को तोड़ना ही हमारी सफलता होगी। उन्होंने मौन नहीं रहने की सलाह देते हुए कहा कि मौन रहने से आप गौण हो जाइएगा।

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ सुरेंद्र कुमार सिंह ने कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए कहा कि शोध के लिए गहन चिंतन आवश्यक है और गहन चिंतन पैनी दृष्टि से ही उत्पन्न होती है। उन्होंने शोध के गिरते स्तर पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज विश्वविद्यालय मात्र क्लासरूम टीचिंग शिक्षण का केंद्र मात्र रह गया है। उन्होंने विश्वविद्यालयों में शोध का केंद्र बनाए जाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि आज से 10 वर्ष पूर्व शोध का स्तर बहुत ही ऊपर था जो आज बहुत नीचे आ गया है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने भी देश में शोध की गिरती स्थिति पर चिंता व्यक्त की है।

महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ वाराणसी के समाजशास्त्र विभाग के प्रो. रविप्रकाश पांडे ने कहा कि लक्ष्य के प्रति जो सतत प्रयास करते हैं और क्रियाशील रहते हैं वे ही सफल होते हैं। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित कार्यशाला को संबोधित करते हुए डॉक्टर पांडे ने कहा कि समाजशास्त्र भी एक विज्ञान है। जिसके तीन शर्त है। उन्होंने कहा कि शोध करते समय शोधार्थी जितना संवेदनशील होगा शोध का स्तर उतना ही अच्छा होगा। परिकल्पना आधारित शोध से शोधार्थियों को दूर रहने की सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि परिकल्पना आधारित शोध निष्कर्षहीन होते हैं।उन्होंने फैक्ट आधारित शोध की वकालत करते हुए कहा कि शोध के लिए निरीक्षण परीक्षण और वर्गीकरण आवश्यक है।

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय के संकायाध्यक्ष एवं कार्यशाला के निदेशक डॉक्टर विनोद कुमार चौधरी ने कहा कि यह कार्यशाला बिहार में अपने ढंग का पहला कार्यशाला है जिसमें देश के कर्णाटक से लेकर जम्मू विश्वविद्यालय के शोधार्थी शामिल हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि शामिल होने वाले शोधार्थियों में छह केंद्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा विश्वविद्यालय से ओडिसा तक सात राज्यों के विश्वविद्यालयों के प्रतिभागी शामिल हैं। 10 दिन तक चलने वाले इस कार्यशाला में देश भर के समाज विज्ञान के 15 विशेषज्ञ शोध पद्धति के विभिन्न आयामों पर अपनी विवेचना प्रस्तुत करेंगे। उन्होंने कर्नाटक, वर्धा, मुंबई, जम्मू, नैनीताल, वाराणसी, झारखंड एवं बिहार के प्रतिभागियों एवं संसाधन सेवियो का अभिनंदन करते हुए कहा कि शोधार्थियों को इस कार्यशाला से शोध के पद्धति और विभिन्न आयामों पर विस्तृत रूप से जानकारी प्राप्त होगी और वे इससे लाभान्वित होंगे।

कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर लक्ष्मी कुमारी ने किया वहीं धन्यवाद ज्ञापन डॉ सारिका पांडे ने किया।
कार्यशाला के उद्दघाटन के दो शैक्षणिक सत्र रानीदुर्गावती विश्वविद्यालय के प्रो सी एस एस ठाकुर के द्वारा संचालित की गयी।
इस अवसर पर डॉ गोपी रमण प्रसाद सिंह द्वारा शोध के पद्धति और आयामों पर लिखे गए एक पुस्तक का भी विमोचन किया गया।

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