आभासी दुनिया देश

जानिए, सांसद का चुनाव हारने वाला कन्हैया हिंदी पट्टी के चिर’कुट, सवर्ण लिबरल लोगों का हीरो क्यों है ?

डेस्क: हिंदी पट्टी के एक नेता का अपनी दादी के घर जाकर अपनी दो बुआओं और चचेरे भाईओं से मिलने जाने पर मचे हंगामा के बाद आदरणीय पंकज के चौधरी द्वारा रचित कालजयी पोस्ट:

भारत जैसा विशाल देश बहुसंख्यक आबादी को कई तरह से आघात पहुंचाता है। हिंदी पट्टी से बाहर हम निकल ही नहीं पाते हैं। यहाँ की राष्ट्रीय पार्टियाँ भी उसी हिंदी पट्टी के लिए रात दिन खटती है। राष्ट्रीय मीडिया के सरोकार भी एनसीआर से बाहर निकल कर लखनऊ, पटना जाते जाते दम तोड़ देती है। बंगाल से आगे क्या है? हम नहीं जानते।

हिंदी पट्टी में भी राष्ट्रीय पार्टियाँ किनके लिए काम करती है? सबका प्रतिनिधित्व करती तो लालू, मुलायम, मायावती क्यों पैदा होते। जो एक राज्य तक नहीं है उसके मुख्यमंत्री केजरीवाल में लोग प्रधानमंत्री की संभावनाएं तलाश रहे हैं। बेगुसराय से सांसद का चुनाव हारने वाले कन्हैया कुमार हिंदी पट्टी के चिर’कुट, सवर्ण लिबरल लोगों के हीरो हैं। बीमार भी हिंदी पट्टी। इलाज भी हिंदी पट्टी से ही निकलेगा।

ये नवीन पटनायक, जगन मोहन रेड्डी, शरद पवार, विजयन, ममता बनर्जी जैसे लोगों के साथ अन्याय है। हिंदी पट्टी की राष्ट्रीय पार्टियाँ, हिंदी पट्टी के सेक्युलर-लिबरल-सामंतवादी-राष्ट्रवादी-हिंदूवा’दी लोग प्रधानमंत्री बनने की योग्यता तय कर चुके हैं। ऐसा आदमी जो या तो गांधी परिवार का हो, या फिर दं’गा फ’साद की भाषा शुद्ध हिंदी में बोलना जानता हो या फिर हिंदी में मार्क्स को ठेलता हो।

इसलिए, मेरा मानना है कि भारत में एक ही राष्ट्रीय पार्टी हो। वो एक बिग बाज़ार जैसा कुछ हो जहाँ ब्रा, पेंटीज, हरी सब्जी, कंडो’म, फर्नीचर, क्रेडिट कार्ड जबरदस्ती बेचने वाले सब के सब एक ही छत के नीचे हों ताकि हिंदी पट्टी के मिडिल क्लास को कोई दिक्कत न हो।

एक ही जगह केजरीवाल, कन्हैया कुमार, राहुल गांधी, जे शाह, प्रियंका गांधी, स्मृति इरानी मिल जाए तो इससे अच्छा क्या होगा? इस एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी में राफ़ेल भी हो और बोफोर्स भी। चिदंबरम भी हो और जेटली भी। हम चाहें तो इस राष्ट्रीय पार्टी का नाम श्यामा प्रसाद नेहरु रख सकते हैं।

इस एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र भी हो ताकि हिंदी बोलने वाले मगर ‘अलग अलग विचारधाराओं को मानने वाले सवर्ण नायकों में बहस हो। और बहस से जीत कर एक चेहरा सामने आए।

बांकी जो बचते हैं वो जातिवादी हैं। भ्रष्ट हैं। वो अपना भविष्य क्षेत्रीय पार्टिओं में देखे।

आलेख: स्वतंत्र टिप्पणीकार पंकज के चौधरी के फेसबुक टाइमलाइन से

Desk
Social Activist
https://khabarilaal.com