उत्तरप्रदेश राजनीती राज्य

लखनऊ होर्डिंग्स केस: सुप्रीम कोर्ट ने योगी सरकार से कहा-कोई कानून आपके पक्ष में नहीं

डेस्क: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लखनऊ में हुई हिं’सा व तोड़फोड़ के आरोपियों के शहर में लगाए गए पोस्टर को हटाने का आदेश दिया था। जिसके खिलाफ यूपी सरकार उच्चतम न्यायालय पहुंची है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई की। यूपी सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पक्ष रखा।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय से आदेश पारित करते हुए गलती हुई है। इसपर न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस ने तुषार मेहता से पूछा कि वह अधिकार कहां है? जिसके तहत यूपी सरकार ने लखनऊ में नागरिकता कानून के खिलाफ कथित आग’जनी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से कहा कि फिलहाल ऐसा कोई कानून नहीं है जो आपकी इस कार्रवाई का समर्थन करता हो। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा कि क्या उसके पास ऐसे पोस्टर लगाने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह बेहद महत्वपूर्ण मामला है।

Image result for yogi supreme court

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि 95 लोग शुरुआती तौर पर पहचाने गए। उनकी तस्वीरें होर्डिंग पर लगाई गईं। इनमें से 57 पर आरोप के सबूत भी हैं, लेकिन आरोपियों ने अब निजता के अधिकार का हवाला देते हुए हाई कोर्ट में होर्डिंग को चुनौती दी, लेकिन पुत्तास्वामी मामले में सुप्रीम कोर्ट के 1994 के फैसले में भी निजता के अधिकार के कई पहलू बताए हैं।

इस पर जस्टिस ललित ने कहा कि अगर दं’गा-फसा’द या लोक संपत्ति नष्ट करने में किसी खास संगठन के लोग सामने दिखते हैं तो कार्रवाई अलग मुद्दा है, लेकिन किसी आम आदमी की तस्वीर लगाने के पीछे क्या तर्क है? सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हमने पहले चेतावनी और सूचना देने के बाद ये होर्डिंग लगाए। प्रेस मीडिया में भी बताया है। तुषार मेहता ने कहा कि हमने आरोपियों को नोटिस जारी करने के बाद कोई जवाब ना मिलने पर अंतिम फैसला किया। 57 लोग आरोपी हैं, जिससे वसूली की जानी चाहिए। हमने भुगतान के लिए 30 दिनों की मोहलत दी थी।

बता दें कि उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को यह भी आदेश दिया था कि कानूनी प्रावधान के बगैर ऐसे पोस्टर नहीं लगाये जायें। अदालत ने आरोपियों के नाम और फोटो के साथ लखनऊ में सड़क किनारे लगाये गये इन पोस्टरों को तुरंत हटाने का निर्देश देते हुये टिप्पणी की थी कि पुलिस की यह कार्रवाई जनता की निजता में अनावश्यक हस्तक्षेप है। अदालत ने लखनऊ के जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस आयुक्त को 16 मार्च या इससे पहले अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया था।