बाबा साहेब मा. कांशीराम व्यक्ति विशेष

भारत के बदलतें सदी में भीमराव अंबेडकर के बाद दूसरा बाबा साहब कैसे कहलाए कांशीराम!!

भारत के आज़ादी के पूर्व देश में ग़रीब औऱ समाज के निचली पायदान से भी नीचे कुछ जाती विशेष के लोग के एक मात्र नेता थे महात्मा ज्योतिराव फुले। जिन्होंने ग़रीब, मजलूमों की लड़ाई लड़ी। महात्मा फुले के बाद हुई बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर जो महात्मा फुले के पदचिन्हों पर चल कर एक नया भारत का निर्माण किया। अंबेडकर आज़ाद भारत के पहले कानून मंत्री बने लेक़िन अपने जीवन हई अनेक घटनाक्रम को भुलाकर सभी को भारतीय मानकर दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान बना दिया। जो दुनिया के सभी देशों के संविधान से उदार औऱ न्यायप्रिय सिद्ध हुआ। उसी के साथ अंबेडकर ने दलितों का उद्धार भी कर दिया। इसलिए उन्हें दलित उद्धारकर्ता के रूप में भी पढ़ा औऱ पढ़ाया जाता हैं। उनकें बाद दलित समाज मजबूत नेतृत्वकर्ता की कमी महशुस करने लगीं। पंजाब के रूपनगर जिला अंतर्गत पिर्थीपुर बुंगा ग्राम, खवसपुर की मिट्टी में जन्में कांशीराम ने दलित समाज की बागडोर संभाली।

भारतीय राजनीति का टर्निंग पॉइंट कैसे बनें बाबा साहेब मान्यवर कांशीराम..

भारत के आज़ादी उपरांत वैदिक भाषा में शुद्र की ख़ेमा में आनेवाले का भारतीय राजनीति में अपना प्रतिनिधित्व लगभग नहीं के बराबर था। हजारों जाती में बिखड़े पड़े सभी समुदायों को बहुजन नाम की एक माला में गूथ दिया। जिसमें भारतीय जाति व्यवस्था के अन्तर्गत सबसे नीचे माने जाने वाले अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा, अति पिछड़ा औऱ अल्पसंख्यक शामिल हैं। उसके बाद भारतीय राजनीति में हजारों जातियों को बहुजन नाम से जानने औऱ पहचानने लग गया। डॉ आंबेडकर के महा परिनिर्वाण के बाद आंबेडकरवाद को गाँव देहात तक पहुचाने वाले कांशीराम का भारतीय राजनीति में उदय हुआ। इसी कड़ी में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना किया। जो कई बार केंद्र में गठबंधन से औऱ राज्य में बड़ी सीट जीतकर दशकों राज कर चूंकि हैं।बहुजन समाज पार्टी मुख्य सोच सार्वभौमिक न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के सर्वोच्च सिद्धांतों पर चलने वाला हैं। इस राजनीतिक दल का सोच बाबा साहेब डॉ आंबेडकर के मानवतावादी दर्शन व बौद्ध दर्शन से प्रेरित है। उन्होंने अपने आंदोलन को जारी रखने के लिए दलित शोषित संघर्ष समिति (डीएसएसएसएस), अखिल भारतीय पिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदायों कर्मचारी महासंघ (बामसेफ) का भी गठन किया हैं। जिसमें बामसेफ मात्र एक संगठन बच गया हैं जो उनकें सपनें को पूरा करने का ताक़त रखता हैं, उनकें विचारों को हू-बहू प्रसारित कर रहा हैं।

भारतीय राजनीतिक पंडितों की नज़र में बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम..

प्रोफ़ेसर दिलीप मंडल लिखतें हैं दलित आंदोलन और बहुजन समाज पार्टी पर शोध करने वाली राजनीतिक विज्ञानी प्रो सुधा पाई के अनुसार उत्तर भारत ख़ासकर उत्तर प्रदेश में कांशीराम को सफलता इसलिए मिली, क्योंकि यहां एक स्वतंत्र दलित आंदोलन पहले से मौजूद था। आगरा, मेरठ, अलीगढ़, कानपुर आदि शहरों में बसे दलितों ख़ासकर चमार-जाटवों की अपेक्षाकृत मज़बूत आर्थिक स्थिति की वजह से ये संभव हो पाया था। इन शहरों में बसे दलितों की आर्थिक स्थिति में मज़बूती चमड़े के सामान की क़ीमत में वृद्धि की वजह से आयी थी।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन की समुद्र मार्ग की सप्लाई चेन टूट गयी थी, जिसकी वजह से सैनिकों के इस्तेमाल में आने वाला चमड़े का सामान ब्रिटेन से आयातित नहीं हो सकता था। पूर्वी मोर्चे पर जापान से लड़ने के लिए सेना को इन सामानों की ज़रूरत थी, जिसकी पूर्ति इन शहरों से बने सामानों ने कीया गया।चमड़े के सामान की क़ीमत में आयी वृद्धि की वजह से इन शहरों के आस-पास रहने वाला दलित समाज पहले की तुलना में मज़बूत हुआ और उसने छोटे-छोटे स्वतंत्र आंदोलन चलाए. प्रो. पाई का आकलन है कि कांशीराम ने उन्हीं छोटे-छोटे आंदोलनों को समाहित करते हुए बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया था।

कांशीराम का राजनीतिक दर्शन, सरकारें मजबूत नहीं मजबूर होने चाहिए

साहेब कांशीराम के राजनीतिक दर्शन पर प्रो. रत्न लाल लिखतें हैं इतिहास से अनुभव दर्शाता है कि जब-जब केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकारे रहीं, ज्यादातर फैसले पूंजीपतियों और सामंती शक्तियों के हक़ में किए गए। ऐसे शासन में क्षेत्रीय आकांक्षाओं, लोक-कल्याण और जन-हित के कार्यों को नज़रंदाज़ किया गया है, दबाया गया है। राजनीतिक दलों और पूंजीपतियों के गठजोड़ का खुलासा करते हुए बीएसपी के संस्थापक साहेब कांशीराम ने कहा था, ‘मनुवादी राजनीतिक दल अपनी-अपनी पार्टियों के लिए पूंजीपतियों से पैसा लेते हैं। नई सरकार बनने पर वे पूंजीपतियों को मनमाफिक जनता को लूटने की छूट देते हैं।’प्रो रत्न लाल सर कहना शत प्रतिशत सही क्योंकि वर्तमान भाजपा सरकार द्वारा 10 प्रतिशत गैर-संवैधानिक सवर्ण आरक्षण, पूंजीपतियों को दिए गए लाखों-करोड़ों रुपए की छूट और एनपीए की वसूली में ढिलाई इसके बेहतरीन उदहारण हैं कि पूर्ण बहुमत की सरकारे कैसे काम करती हैं। जनता के राजनीतिक प्रशिक्षण के लिए कांशीराम ने बार-बार चुनाव की जरूरत पर भी बल दिया, जिससे कि उन्हें चुनाव-लीला के सभी तरीकों, गुणों/अवगुणों का ज्ञान हो सके। उनका मानना था कि बार-बार चुनाव होने और अल्पमत की सरकार बनने से वे जन सरोकार के मुद्दों पर ध्यान देने के लिए विवश होंगी, पूंजीपतियों के हित में कठोर निर्णय नहीं ले सकेंगी और जनता को हमेशा नए अवसर और विकल्प मिलते रहेंगे।

मान्यवर कांशीराम और आंदोलन

साहेब कांशीराम ने जो किया वो भारतीय राजनीति में कभी नहीं हुआ था। उनके जाने के बाद क्या कभी ऐसा हो पाएगा, ये सवाल सभी बहुजनों को परेशान करता है। 2004 में मान्यवर को लकवा मार गया और बहुजन राजनीति का तेजी से बढ़ता ग्राफ़ रुक गया। जिससे बहुजन आंदोलन बहुत कमज़ोर पर गई, उसके बाद अभी तक बहुजन आंदोलन उस ट्रेक पर नहीं आ पाया है जिस पर कांशीराम छोड़ गए थे
कांशीराम जी बौद्ध धर्म स्वीकार करना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने 2006 में अक्टूबर का दिन भी तय कर लिया था। लेकिन उनके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हो सका और 9 अक्टूबर 2006 को दिल्ली के हुमायूं रोड पर दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। आज उनका 86वी जयंती हैं।

(लेखक: डी के बालक ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी से पीजी के छात्र हैं। ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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