आभासी दुनिया

क्या विडंबना है ! जो खुद #$ड भी नहीं धोते हैं, वो हमें हाथ धोना क्या सिखाएंगे ?

डेस्क: एक 5 स्टार होटल होता है। उसके लाउन्ज में शैम्पेन तोड़ते कुछ बुद्धिजीवी बैठे होते हैं। कोई अमेरिका रिटर्न है, कोई चीन रह कर आया है तो किसी ने यूरोप में डेरा जमा रखा है। सब मिल कर भारत को गालि’याँ देते हैं और बताते हैं कि फलाँ देश के लोग कितने सभ्य हैं, फलाँ देश में सबकुछ चकाचक है और चिलाँ विदेशी शहर में कैसे सबकुछ एकदम खुला-खुला है। “Blo-ody Indians” कहने वाले ये वही लोग हैं, जो हमें अस’हिष्णु भी बताते हैं। आप जानते हैं कि ये कौन लोग हैं? आइए, बताता हूँ कि ये कौन हैं। मान लीजिए, ये बातचीत एकाध साल पहले हुई होगी। ये लोग, जो देश की जनसंख्या और गरीबी को समझे बिना इसकी तुलना ऐसे देशों से करते हैं, जिसका पॉपुलेशन हमारे एक शहर के बराबर भी नहीं।

मार्च 2020. दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर एयर इंडिया की फ्लाइट उतरती है। उसमें से भर-भर कर लोग उतारे जाते हैं। उनमें से ये इटली, अमेरिका, चीन और फलाँ-चिलाँ देश वाले फिर इकट्ठे होते हैं और एक-दूसरे से नज़र चुराते-चुराते आखिर मिल ही जाते हैं। पता चल गया न कौन लोग हैं ये? फलाँ-चिलाँ देशों में रह कर भारत व भारतीयों को गा’ली देने वाले, उन्हें गंदा कहने वाले और अपनी ही मातृभूमि का मजाक उड़ाने वाले इन लोगों के लिए अब वही सारे देश नरक बन गए हैं जिनके कसीदे पढ़ते हुए ये भारत को गालियाँ बकते थे और जब बात जान पर बन आई है तो यही भारत की सरकार उन्हें वापस ला रही है।

लेकिन इनमें से कुछ हैं जो थेथर हैं। कुछ की अक्ल तो कोरोना ने ठिकाने ला दी। कुछ ऐसे हैं, जो एयरपोर्ट्स पर, आइसोलेशन व क्वारंटाइन सेंटरों में और हॉस्पिटलों में 5 स्टार सुविधा माँग रहे हैं और इसके लिए हंगामा कर रहे हैं। इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जो सेक्रेटरी और बॉडीगार्ड लेकर चलते हैं। फलाँ-चिलाँ देशों की सभ्यताएँ काम नहीं आ रही हैं। इसी ‘अस’हिष्णु’ और ‘गंदे’ देश में इनकी जान बच रही है। इनमें से कइयों ने तो कुछेक अवॉर्ड्स भी वापस किए होंगे। यही ‘ताना’शाह’ मोदी आज इनके लिए सोच रहा है। इसी सनातन संस्कृति का ‘नमस्ते’ वाला अभिवादन अपनाने के लिए दुनिया भर के विशेषज्ञ इन्हें सलाह दे रहे हैं।

कुल मिला कर बात ये है कि अगर भारत में कुछ कमी है तो हमें इसीलिए कोसा जा सकता है कि हमने अपनी प्राचीन संस्कृति को अलविदा कह दिया लेकिन फलाँ-चिलाँ देशों से सीखने को लेकर भारतीयों का मजाक नहीं बनाया जा सकता। क्योंकि जो #$ड भी नहीं धोते हैं, वो हमें नहीं सिखा सकते कि हाथ कैसे धोना है। अच्छा हाँ, जर्मनी में एक स्टार्टअप आया है जो डॉक्टरों की सलाह के आधार पर पत्ते वाली थाली बेच रहा है। कहा जा रहा है कि केले व ताल के पत्तों पर खाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।

आलेख: युवा जर्नलिस्ट अनुपम के सिंह के फेसबुक वॉल से।