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देश की एक ज़िम्मेवार नागरिक का खत पीएम मोदी के नाम, प्लीज ! उनतक पहुंचाने में मदद करें

डेस्क: आदरणीय प्रधानमंत्री मोदी जी,

जानती हूँ कि ये चिट्ठी शायद आप तक कभी न पहुँचेगा लेकिन फिर भी मुझे लिखना ज़रूरी लगा इसलिए लिख रही हूँ.

सर, पहले तो शुक्रिया कि आपने देशहित के लिए 21 दिनों का लॉक-डाउन घोषित किया. उसके बाद ट्वीट करके ये भी बताया कि ज़रूरत की सभी वस्तुएँ भी मिलेंगी इन 21 दिनों. घबराने की बात नहीं है. आप सभी अपना कर्म निभाइए और घर पर रहिए. और हम सब ने सिर माथे पर आपकी कही बात को लिया. अब हम सब लगभग अपने-अपने घरों में क़ैद हैं. ख़ैर, इससे कोई शिकायत भी नहीं है.

दरअसल, सर मुझे शिकायत आपके उस रवैए से है जो आप शायद नोटिस भी नहीं करते. आप देश को सम्बोधित करने आते हैं और बस अपना फ़ैसला सुना कर चले जाते हैं. आप आगे-पीछे का नहीं सोचते सर. नोटबंदी के वक़्त भी यही हुआ था और आज कोरोना के लॉक-डाउन में भी देश लगभग उसी स्थिति में खड़ा है.

सर, आपको अच्छे से पता रहा होगा कि इतवार वाले जनता कर्फ़्यू के बाद आप देशव्यापी लॉक-डाउन करेंगे. साथ ही साथ आपको अपने देश के बारे में भी पता है ही. आप जानते हैं न कि बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश इत्यादि राज्यों से लाखों लोग रोज़गार के लिए मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में आ कर रह रहें हैं. वो सुबह को कमाने निकलते हैं और शाम को खाने की वस्तुयें ले कर घर लौटते हैं. वो डेली-बेसिस पर जीते हैं. वो स्टॉक नहीं कर सकते रोज़मर्रा की चीजें.

अब जब लॉक-डाउन हुआ. आप आठ बजे टी॰वी॰ पर आ कर घोषणा कर दिए. सभी राज्य की सीमाएँ लॉक हो गयी. ट्रेन और बसें बंद कर दो गयीं. ऐसे में न तो इन मज़दूरों के पास काम रहा और न अपने घर, अपने गाँव लौटने के लिए संसाधन. सर ये लोग अपनी जान को ख़तरे में डाल कर दिल्ली और मुंबई से पैदल ही निकल गए अपने-अपने राज्यों के लिए. इस जाने वाली भीड़ में दो साल का बच्चा शामिल है,औरतें शामिल हैं और पुरुष तो हैं ही. ये जब 20-20किलोमीटर पैदल चल कर किसी पुलिस चौकी या किसी राज्य की सीमा पर पहुँच रहें तो पुलिसकर्मी इन्हें ट्रकों में जानवरों की तरह लाद कर उन्हें दूसरे राज्य की सीमा तक पहुँचाने का काम कर रही. तो कहीं जानवरों की तरह उनके साथ ज़्यादती हो रही. वो सड़कों पर रातें गुज़ारने को बेबस हैं.

सर, अब मेरे कुछ सवाल हैं. पहला सवाल ये कि क्या आपको नहीं लगता कि लॉक-डाउन करने से पहले आपको इन मज़दूरों के बारे में सोचना चाहिए था. कोरोना वाइरस की वजह से बंद हुई दुकानें, होटल और बाक़ी के बेग़ारी वाले काम इन्हें मिलना पहले ही बंद हो चुका था. तो ऐसे में आपको अपने लॉक-डाउन वाले सम्बोधन से पहले उनके लिए क्या इंतज़ाम किए गए हैं ये बताने की आवश्यकता क्यों नहीं महसूस हुई.

अगर इन मज़दूरों के रहने का इंतज़ाम हर राज्य के बंद पड़े स्कूल और कॉलेज में टेम्प्ररी तौर पर कर दिया जाता. जैसे अमेरिका और बाक़ी के देश शेल्टर होम में खोल कर करते हैं.जहाँ इन मज़दूरों को दो वक़्त का खाना और रात बिताने के लिए अगर छत मयस्सर होता तो शायद ये अपनी ज़िंदगी और साथ में बाक़ियों की ज़िंदगी को दाँव पर लगा कर अपने-अपने गाँव की तरफ़ नहीं भागते.

सर, वोट तो इनलोगों ने भी दिया है. इस देश के ये भी नागरिक हैं. इनकी ज़िम्मेवारी भी तो देश के मुखिया होने के नाते आप पर ही है न तो फिर आपने क्यों नहीं सोचा इनके लिए? एक आम नागरिक के तौर पर मैं निराश हुईं हूँ आपके इस अन-प्लांड फ़ैसले से. उम्मीद की कोई लौ मुझे इन मज़दूरों के लिए नहीं जलती दिख रही. जब ये अपने गाँव पहुँचेंगे तो पता नहीं इनका क्या हाल होगा? ये कितने लोगों संकर्मित करेंगे या वहाँ इनकी स्क्रीनिंग हो पाएगी. बिहार में तो असंभव जान पड़ता है.

सर, अब भी वक़्त है. भारत की जान गाँवों में बसती है. डॉक्टर की टीम को गाँव भेजिए. साथ ही साथ गाँव की दुकानों में राशन और मेडिकल स्टोर में दवाई उपलब्ध हो इसके लिए भी प्रयास कीजीएगा. देश को इस मुश्किल वक़्त में आपसे उम्मीदें हैं. प्लीज़ निराश मत कीजिएगा.

इस देश की एक ज़िम्मेवार नागरिक
– Anu Roy

पत्र: स्वतंत्र स्तंभकार Anu Roy जी के फेसबुक वॉल से