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भारतीय क्रिकेट टीम(Indian Cricket Team) की कप्तानी का कंपास दक्षिण की ओर कब घूमेगा?

Desk: धोनी(mahendra singh dhoni) की कप्तानी छोड़ने के बाद हुई रिक्तता को विराट ने टेस्ट क्रिकेट में बखूबी अंजाम दिया। हाँ! ये जरूर है कि चीकू की कप्तानी का स्वाद देसी पिचों पर एकदम जायकेदार था और विदेशी पिचों पर ये कुछेक मौके पर बेस्वाद नजर आई। हालांकि विराट के खेल की अभी संध्यावेला न हुई है। वर्ष 2014 में जब क्रिकेट पंडितों ने उनकी फार्म अवापसी पर अपनी मुहर चस्पा कर दी थी तब विराट ने अपने खेल को इस तरह से मांजा कि देसी पिचों पर वो अजेय हो गए। फिर मुकाबले में चाहे कोई भी टीम रही हो, टेस्ट सीरीज भारत ही जीतता था। विराट की कप्तानी में देसी पिचों पर खेली गई 11 में 11 सीरीज भारत ने ही जीती। आलोचनाओं और सराहनाओ के वक्र में अगर विराट के खेल को मापा जाएगा तो ये हमेशा सराहना की ओर ही घूमेगा। विराट को ये मलाल हमेशा ही रहेगा कि वो इंग्लैंड, न्यूजीलैंड और साउथ अफ्रीका को उनकी ही मांद में मात क्यों न दे पाएं?

चर्चाओं का बाजार गर्म

अब जब विराट(virat kohli) ने कप्तानी छोड़ दी है तो ये अमूल्य रिक्त किसे मिलेगी, इस को लेकर भी चर्चाओं का बाजार गरम है। सब अपने-अपने हिस्से के और अपनी-अपनी पसंद के कप्तानों पर दांव लगा रहे है। भावनाओं के देश भारत में क्रिकेट भी एक भावना है और लोग इससे जुड़े मसलों पर अक्सर भावुक भी हो ही जाते है। कई लोग इस समय पंत को कप्तानी दिए जाने को लेकर इस कदर भावुक हुए पड़े है गोया पंत को कप्तानी मिलते ही टीम का कायाकल्प हो जाएगा। जबकि पंत का ऐतिहासिक रिकार्ड इस बात का घोर विरोध करता है कि उनके हिस्से इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को सौंपा जाएं। अव्वल तो पंत अभी महज 24 बरस के है, दूसरी बात उनमें जो हड़बड़ी है वो टीम के लिए घातक सिद्ध हो सकती है, अपने निजी खेल को बचाने के लिए जो धीरता चाहिए, उसमें वो अक्सर असफल हो जाते है तो कप्तानी सरीखी बड़ी जिम्मेदारी वो कैसे ही निभा पाएंगे भला? कप्तानी के लिए आशुधीर बनना पड़ता है। ऑस्ट्रेलिया के महान विकेटकीपर गिलक्रिस्ट के खेल का छौंनापन और उन्मुक्तता इस वजह से भी बनी रही क्योंकि उन्होंने इक्का-दुक्का मौके पर ही कप्तानी की थी।

चर्चाओं के गरम बाजार में जिस पक्ष के लिए सबसे ज्यादा भीड़ का जुटान हुआ है, वो हैं- फुटवर्क के नटराज रोहित शर्मा।(Rohit Sharma) शास्त्रीय खिलाड़ी रोहित शर्मा के ऊपर सफेद बॉल वाले क्रिकेट प्रारूपों की जिम्मेदारी है। ऊपर से कुछ एक-दो ही बरस के अंतराल पर विश्वकप और टी ट्वेंटी विश्वकप है। इसके अलावा दो महीने वो आईपीएल में मुंबई इंडियंस की कप्तानी भी करते है। ऐसे में उनसे टेस्ट क्रिकेट की कप्तानी कितना ही सधेगी, ये तो भगवान ही जाने? चूंकि टेस्ट क्रिकेट खुद में एक धैर्य का इम्तिहान है और योजनाओं का कुरुक्षेत्र है। अब इसमें वो ही सफल हो सकता है जिसके पास इस फार्मेट पर विचार कर सकने लायक ठीकठाक समय हो। भारतीय क्रिकेट और उसकी सोंधी महक को जीवट बनाएं रखने के लिए ये आवश्यक है कि भारत के पास एक-दो आईसीसी ट्रॉफी आएं। इसके लिए रोहित शर्मा का कंप्लीट फोकस जरूरी है।

रोहित नहीं तो फिर कौन?

बात ये है कि अगर रोहित नहीं तो फिर कौन? तीसरे दावेदार है- के.एल.राहुल(k.l. Rahul)। राहुल का खेल अभी युवान है और परवान चढ़ रहा है। क्लास के मामले में वो बेजोड़ है और बहुत लंबी रेस के घोड़े भी है। उन्हें ये जिम्मेदारी अगर सौंपी जाती है और अगर वो इसमें सफल होते है तो बोर्ड को लंबे समय के लिए कप्तान को खोजने की जरूरत न पड़ेगी। मगर राहुल के पास सिर्फ एक टेस्ट मैच की कप्तानी का अनुभव है। फर्स्ट क्लास के भी एक ही मैच में उन्होंने कप्तानी की है। किंग्स इलेवन पंजाब की कप्तानी के दौरान भी उन्होंने कोई ऐसा करिश्मा न किया है जो उन्हें इस सीट का प्रबल दावेदार बनाएं। सो मेरी नजर में उन्हें अभी और अधिक स्वछंदता के साथ खेलने देना चाहिए। चौथे दावेदार की बात की जाएं तो वो है,आर अश्विन। कुंबले के बाद अगर कोई शानदार मैच विनिंग स्पिनर है तो वो है-आर अश्विन। कप्तानी के वो स्वभाविक दावेदार है। उनके क्रिकेट खेलने और इसे खेलवाने की ऐसी शैली है जो उन्हें कप्तानी के लिए एक सहज उम्मीदवार बनाती है। उन्होंने आईपीएल में पंजाब के लिए कुछेक मौकों पर एक आदर्श कप्तानी भी की है। मेरी नजर में इस चैंपियन को टेस्ट की कप्तानी का मौका मिलना चाहिए। खासकर तब जबकि कपिल देव के बाद किसी शानदार गेंदबाज ने भारत के लिए कप्तानी न की हो!

ग्लैमर से इतर जीतने और बस जीतने की चाह वाले कप्तान की जरुरत

खैर! कप्तानी ज्यादातर या तो नार्थ जोन के हिस्से या फिर वेस्ट जोन के हिस्से ही रही है। हाँ! जगमोहन डालमिया के काल मे जरूर ईस्ट जोन के हिस्से कप्तानी आई और क्या खूब आई! ईस्ट जोन से आने वाले दादा यानी सौरव गांगुली भारतीय क्रिकेट(Indian Cricket) के सफलतम कप्तानों में से एक है। भारतीय क्रिकेट टीम को शेप और बिल्ड अप करने में उनकी अतुलनीय भूमिका है। एक अन्य कप्तान जिन्होंने भारतीय क्रिकेट को अपने औदात्यमयी स्वभाव के साथ बड़ी जीतें दी, वो भी ईस्ट जोन से आते है और उनका नाम है-महेंद्र सिंह धोनी। उन्हें भी दिलीप वेंगसरकर की जिद पर लाया गया था। साउथ जोन से अगर किसी खिलाड़ी को कप्तानी दी जा सकती है तो है, हनुमा विहारी। उन्होंने महज 13 टेस्ट मैच खेले है मगर इनमें से 12 मैच उन्होंने एशियाई महाद्वीप के बाहर खेले है जहाँ बल्लेबाजी करना बेहद जटिल है। उन्होंने पिछले साल सिडनी टेस्ट को बचाने में एक अहम भूमिका निभाई थी। इसके अलावा आंध्र प्रदेश की कप्तानी करने का उनके पास एक अच्छा खासा अनुभव है। हालांकि हनुमा के खेल और उनके व्यक्तित्व में वो स्टारडम न है जो क्रिकेट का भद्र लोक और इसके खांटी दर्शक अपने के कप्तान में खोजते है। फिर भी उनका दत्तचित्त स्वभाव, शांति के साथ अपना खेल को खेलते जाना और एक जुझारू टेम्परामेंट, उन्हें इस कुर्सी के लिए उपयुक्त बनाता है। वैसे भी अब क्रिकेट को एक ऐसे कप्तान की जरूरत हो जो लाइमलाइट से दूर बस खेल के प्रवाह में खुद को और टीम को बहने दें ताकि टीम ग्लैमर से इतर जीतने और बस जीतने की चाह लिए मैदान में उतरे।

आलेख: संकर्षण शुक्ला के फेसबुक टाइमलाइन से