बिहार राजनीती राज्य

बिहार विधानसभा विवाद की वह बात, जिसे बिहार के अखबारों ने नहीं प्रकाशित किया

Desk: बिहार कई मामलों में उदाहरण है। लेकिन आज जिस वजह से मैं यह बात दर्ज कर रहा हूं, उसकी वजह कल की घटना है। दरअसल, कल कार्यपालिका और विधायिका के बीच टकराव का प्रत्यक्ष उदाहरण दिखा। हालांकि इस घटना को सवर्ण मीडिया ने कुछ दूसरे ही अंदाज में प्रस्तुत किया है। ऐसा करने के पीछे उनकी वजह संभवत: यह रही कि वे दोनों के प्रति वफादार बने रहना चाहते हैं। चूंकि बिहार में सत्ता नीतीश कुमार की है तो उनकी बात को गलत तरीके से या नहीं प्रकाशित करने का साहस बिहार के अखबार फिलहाल नहीं कर सकते। वहीं उन्हें अपने द्विजवादी मंसूबों का भी ध्यान रखना है। लिहजा अखबारों ने इस पूरी घटना को एक बेहद सामान्य घटना में बदल दिया है।

घटना बेहद असमान्य थी

लेकिन यह घटना बेहद असामान्य है। जिस तरह से उंगली दिखाकर नीतीश कुमार ने विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा को जमकर डांटा, वह सामान्य नहीं था। दरअसल, विधानसभा अध्यक्ष कार्यपालिका के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप कर रहे थे। वह भी गृह विभाग के काम में जो नीतीश कुमार के अधीन है। जाहिर तौर पर बिहार की पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठाने का मतलब नीतीश कुमार के उपर सवाल उठाना है। जो राजनीतिक पत्रकारिता का अध्ययन कर रहे हैं या फिर रूचि रखते हैं, उनके लिए यह घटना बेहद दिलचस्प है।

यह भी पढ़ें अभी-अभी: विधानसभा विवाद के बाद राज्यपाल से मिले सीएम नीतीश, हो गया खेला ?

दरअसल, पूरे मामले की पृष्ठभूमि बड़ी लंबी-चौड़ी है। पहले तो यह मसला सदन में उठाया गया कि पचास दिनों के अंदर लखीसराय जिले में 9 लोगों की हत्याएं हुई हैं। इसे लेकर भाजपा के एक सदस्य ने सवाल पूछा था। यह सवाल पूछना ही गठबंधन धर्म का अपमान था। अब यह क्या बात हुई कि सत्ता पक्ष के लोग ही सरकार के कामकाज पर सवाल उठाएं और वह भी सीधे-सीधे नीतीश कुमार के काम पर। खैर, सवाल आया तो सरकार की ओर से प्रभारी मंत्री ने सदन में जवाब भी दिया और 8 हत्याओं के संबंध में जानकारी दी। उन्होंने यह भी कहा कि सभी मामलों की जांच चल रही है।

सवाल का उद्देश्य जनहित नहीं था

चूंकि उक्त सवाल का उद्देश्य जनहित नहीं था, बल्कि नीतीश कुमार के उपर लगाम कसना था, इसलिए विधानसभा अध्यक्ष ने इस मामले को सदन की विशेषाधिकार समिति को भेजने का नियमन दिया। यह ऐसा नियमन था, जिसने विधानसभा में खलबली मचा दी। मतलब यह कि जिन मामलों की जांच तथाकथित तौर पर बिहार पुलिस कर रही है, उन मामलों की जांच विधानसभा की कमेटी करेगी। यहां तक तो बात कुछ हद तक ठीक थी, लेकिन कल जो हुआ, वह अलहदा था।

भाजपा के संजय सरावगी ने यह मामला फिर उठाया। सदन में प्रभारी मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने फिर से पुराना जवाब सुना दिया। बस इसी बात से विधानसभा अध्यक्ष भड़क गए और उन्होंने दो दिनों के बाद फिर से जवाब देने की बात कही। अब इस बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विधानसभा में प्रकट होते हैं और वे एक जुमला बार-बार दुहराते हैं कि सरकार न तो किसी को फंसाती है और ना ही बचाती है। वे विधानसभा अध्यक्ष को बताते हैं कि जिन मामलों की जांच पुलिस कर रही है, उनकी रपटें न्ययालय को समर्पित की जाती है ना कि सदन में।

घटना विधानसभा अध्यक्ष के लिए बेहद अपमानजनक थी

दरअसल जब वे यह कह रहे थे तब उनके मन की पीड़ा खुलकर सामने आ गयी कि भाजपा राज्य में उनके माथे पर नाच रही है। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष को संविधान देखने की बात कह दी। जिस अंदाज में नीतीश कुमार ने अपनी बातें कहीं, वह विधानसभा अध्यक्ष के लिए बेहद अपमानजनक थीं। नीतीश कुमार की जगह यदि कोई और मसलन नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव होते तो यह मुमकिन था कि विजय कुमार सिन्हा बाहर से पुलिस बुलवाकर उनके उपर हिंसा करने का आदेश दे देते। लेकिन तेजस्वी यादव तो थे नहीं, उनका अपमान करनेवाला बिहार का मुख्यमंत्री था। सो बेचारे यह नियमन भी नहीं दे सके कि आपकी बातें कार्यवाही का हिस्सा नहीं हैं।

बिहार में दिन-ब-दिन अपराधियों का आतंक बढ़ता जा रहा है

तो कुल मिलाकर यह एक क्लासिकल उदाहरण है कार्यपालिका और विधायिका के बीच टकराव और पत्रकारिता के लिहाज से। वैसे यह तो एकदम प्रारंभ है। रही बात बिहार में हिंसा की तो बिहार में दिन-ब-दिन अपराधियों का आतंक बढ़ता जा रहा है। कल की ही बात करूं तो बिहार में 39 हत्याएं हुई हैं। बलात्कार की चार घटनाएं घटित हुई हैं। लूटपाट की घटना 8 घटनाएं हुईं। बानगी के तौर पर यह देखिए कि कल पटना सिटी में एक छोटे-मोटे दुकानदार की हत्या दिनदहाड़े गोली मारकर कर दी गयी। कोशी इलाके के सहरसा जिले के नवहट्टा थाना क्षेत्र में रमेश चौधरी नामक एक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी गयी। वहीं भागलपुर में सरोजिनी पेट्रोल पंप के मालिक प्रवीण तिवारी और उनके मैनेजर से अपराधियों ने दिनदहाड़े करीब दस लाख रुपए लूट लिये।

नितीश कुमार

बहरहाल, यह सूची बेहद लंबी है। लेकिन यह न तो नीतीश कुमार कभी स्वीकार करेंगे कि बिहार में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं और ना ही उनके साझेदार। अखबारों के पास तो ऐसे भी नैतिकता का अभाव है।
कल प्रेमिका के कहने पर एक कविता लिखी।
कदम बढाओ तुम उस ओर
जिधर है
एक ऊंचा पहाड़
जिसके गुलबूटों को है
तुम्हारा इंतजार
और वहीं मिलूंगा मैं
तुम्हारी बाट जोहता।
हां, कदम बढ़ाओ तुम ताकि
ढलती हुई शाम से कह सकें
हम यायावर हैं, अजनबी नहीं।

आलेख: नवल किशोर कुमार