वाराणसी: काशी की सांगीतिक परंपरा एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्वर में गूंज उठी, जब रूस के सितार वादक स्टेपन सितार और वाराणसी के प्रख्यात तबला वादक कुशल कृष्ण ने एक साथ मंच साझा कर शास्त्रीय संगीत प्रेमियों को भाव विभोर होने के लिए मजबुर कर दिया। कार्यक्रम में राग झिझोटी की मनमोहक प्रस्तुति और तीनताल की जटिल लयकारी ने श्रोताओं को देर तक कार्यक्रम स्थल पर बांधे रखा।
स्टेपन सितार द्वारा राग घीघोंटी के अलाप से हुआ कार्यक्रम का प्रारंभ
कार्यक्रम की शुरुआत स्टेपन सितार द्वारा राग घीघोंटी के आलाप से हुआ, जिसमें उन्होंने धीरे-धीरे राग के स्वरूप को विस्तार देते हुए उसकी गहराई और भाव पक्ष को उभारा। उनकी प्रस्तुति में भारतीय शास्त्रीय संगीत की गंभीर साधना और विदेशी कलाकार के रूप में उनकी लगन साफ झलक रही थी। जैसे-जैसे प्रस्तुति आगे बढ़ी, मध्यम और द्रुत लय में गतों के माध्यम से उन्होंने राग की सुंदरता को और निखारा।
सितार और तबला की जुगलबंदी में श्रोताओं को किया रोमांचित
तबला पर संगत करते हुए कुशल कृष्ण ने तीनताल में अपनी लयकारी का शानदार प्रदर्शन किया। उनकी थाप, बोलों की स्पष्टता और तिहाइयों की सटीकता ने प्रस्तुति को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। सितार और तबला के बीच संवादात्मक शैली में हुई जुगलबंदी ने श्रोताओं को रोमांचित कर दिया।
तालियों की गड़गड़ाहट ने किया उत्साहवर्धन
विशेष रूप से द्रुत लय में प्रस्तुत गत और उसके बाद तबले की पेशकार, कायदा और रेला ने कार्यक्रम को चरम पर पहुंचा दिया। श्रोताओं ने हर मनभावन बंदिश और लयकारी पर तालियों से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।
भारतीय शास्त्रीय संगीत की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रतीक
इस अवसर पर संगीत प्रेमियों ने कहा कि यह प्रस्तुति भारतीय शास्त्रीय संगीत की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रतीक है। एक ओर जहां रूस के कलाकार ने भारतीय राग की आत्मा को जीवंत किया, वहीं बनारस के तबला वादक ने अपनी परंपरा की गहराई को प्रदर्शित किया।
संगीत विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ने का सशक्त माध्यम है
कार्यक्रम ने यह साबित किया कि संगीत की कोई सीमा नहीं होती और यह विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ने का सशक्त माध्यम है। ऐसी प्रस्तुतियां न केवल काशी की सांगीतिक विरासत को समृद्ध करती हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संगीत की प्रतिष्ठा को भी मजबूत करती हैं।

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