Khabrilaal News Desk :

बांग्लादेश की राजनीति और कूटनीति में इन दिनों एक नाम तेजी से चर्चा में है — डॉ. खलीलुर रहमान। कभी मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर रहे खलीलुर रहमान अब BNP सरकार में विदेश मंत्री बन चुके हैं। उनकी नियुक्ति ने न सिर्फ विपक्ष बल्कि सत्ताधारी दल के नेताओं को भी चौंका दिया।

BNP नेताओं को भी नहीं थी उम्मीद

तारिक रहमान द्वारा विदेश मंत्री बनाए जाने के बाद BNP के कई वरिष्ठ नेता हैरान रह गए। पार्टी के भीतर सवाल उठने लगे कि एक ऐसा व्यक्ति जिसकी जड़ें पार्टी में नहीं हैं, उसे देश की विदेश और सुरक्षा नीति की जिम्मेदारी कैसे दी गई। कुछ नेताओं ने तो उन्हें “बाहरी व्यक्ति” तक करार दिया।

हर सरकार में बने रहे प्रभावशाली

बांग्लादेश की राजनीति में सत्ता बदलने के साथ पुराने चेहरे गायब हो जाते हैं, लेकिन खलीलुर रहमान उन चुनिंदा लोगों में शामिल हैं जो हर सत्ता परिवर्तन के बाद भी प्रभाव बनाए रखने में सफल रहे। उन्होंने 1977 में सिविल सेवा परीक्षा में टॉप किया था और बाद में हार्वर्ड तथा फ्लेचर स्कूल जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं से पढ़ाई की।

चीन और अमेरिका दोनों को साधने की कोशिश

विशेषज्ञों का मानना है कि खलीलुर रहमान की सबसे बड़ी ताकत उनकी संतुलित कूटनीति है। एक तरफ वे चीन के साथ तीस्ता प्रोजेक्ट और निवेश को आगे बढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका के साथ भी रणनीतिक समझौते बनाए हुए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक बांग्लादेश और अमेरिका के बीच ऐसे समझौते हुए हैं जिनसे भविष्य में चीन के बड़े निवेश पर अमेरिकी निगरानी बनी रह सकती है।

तीस्ता प्रोजेक्ट पर भारत की बढ़ी चिंता

खलीलुर रहमान ने तीस्ता नदी प्रोजेक्ट में चीन की भूमिका को फिर से सक्रिय कर भारत की चिंता बढ़ा दी है। यह मुद्दा लंबे समय से भारत-बांग्लादेश संबंधों में संवेदनशील माना जाता रहा है। शेख हसीना सरकार इस विषय पर काफी सतर्क रहती थी, लेकिन अब नई सरकार खुलकर चीन के साथ आगे बढ़ती दिख रही है।

भारत के साथ रिश्तों में भी बदलाव

विश्लेषकों का कहना है कि तारिक रहमान और खलीलुर रहमान की जोड़ी भारत के साथ रिश्तों को नए तरीके से संतुलित करने की कोशिश कर रही है। भारत में भी अब बांग्लादेश को लेकर पहले जैसी सख्त बयानबाजी कम और व्यावहारिक सहयोग की बातें ज्यादा होने लगी हैं।

कई मोर्चों पर घिरा है बांग्लादेश

बांग्लादेश इस समय आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक दबावों के बीच फंसा हुआ है। पश्चिमी बाजारों पर निर्भरता, चीन से निवेश, भारत के साथ सीमा और रणनीतिक संबंध तथा रोहिंग्या संकट जैसी चुनौतियों के बीच खलीलुर रहमान को बांग्लादेश की विदेश नीति का नया रणनीतिक चेहरा माना जा रहा है।

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