Khabarilaal News Desk :
भारत ने सिंधु जल संधि (IWT) को लेकर अपने रुख को और सख्त करते हुए चिनाब नदी से जुड़ी दो बड़ी परियोजनाओं पर तेजी से काम शुरू कर दिया है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य चिनाब के अतिरिक्त पानी को ब्यास बेसिन की ओर मोड़ना बताया जा रहा है।
चिनाब नदी पर सुरंग परियोजना
रिपोर्ट्स के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति क्षेत्र में करीब 8.7 से 9 किलोमीटर लंबी एक सुरंग का निर्माण किया जा रहा है। इस परियोजना के तहत चिनाब की सहायक नदी चंद्रा के पानी को ब्यास बेसिन की ओर मोड़ा जाएगा। यह कार्य नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) के तहत लगभग 2,300 से 2,600 करोड़ रुपये की लागत से किया जा रहा है।
रणनीतिक रूप से अहम इलाका
यह परियोजना ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में स्थित है, जो रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। सुरंग का निर्माण रोहतांग के अटल टनल क्षेत्र के पास किया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, यह कदम केवल ऊर्जा या इंजीनियरिंग परियोजना नहीं है, बल्कि जल संसाधनों के अधिकतम उपयोग से भी जुड़ा है।
ब्यास बेसिन की ओर मोड़ा जाएगा पानी
चिनाब-ब्यास लिंक प्रोजेक्ट के तहत नदी के पानी को नियंत्रित कर हाइड्रोलिक संरचनाओं और बैराज के माध्यम से दिशा बदलने की योजना है। इससे उत्तरी भारत में जल प्रबंधन और जलविद्युत उत्पादन क्षमता बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
सिंधु जल संधि पर सख्त रुख
भारत ने हाल के वर्षों में सिंधु जल संधि के तहत पश्चिमी नदियों के उपयोग को लेकर अपना रुख सख्त किया है। 1960 की इस संधि के तहत चिनाब, झेलम और सिंधु जैसी नदियों पर पाकिस्तान को प्राथमिक अधिकार दिए गए हैं, जबकि भारत को सीमित उपयोग और जलविद्युत परियोजनाओं की अनुमति है।
सरकारी नीति के अनुसार, भारत अब पश्चिमी नदियों के जल संसाधनों के अधिकतम उपयोग की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
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