Khabarilaal News Desk :
आधुनिक और शिक्षित भारत में भी दहेज प्रथा एक गंभीर सामाजिक समस्या बनी हुई है। हाल के मामलों में भोपाल की ट्विशा, ग्रेटर नोएडा की दीपिका और दिल्ली की काजल चौधरी की मौतों ने एक बार फिर इस कुप्रथा की भयावहता को सामने ला दिया है। परिजनों का आरोप है कि इन महिलाओं की मौतें दहेज उत्पीड़न के कारण हुईं।
दहेज हिंसा के आंकड़े चौंकाने वाले
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, 2024 में दहेज से जुड़ी हिंसा के कारण प्रतिदिन औसतन 16 महिलाओं की मौत हुई। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि दहेज हत्या के मामलों में दिल्ली लगातार पांचवें वर्ष भी बड़े शहरों में शीर्ष पर रही, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक में उत्पीड़न के सबसे ज्यादा मामले दर्ज हुए।
पढ़ी-लिखी महिलाएं भी सुरक्षित नहीं
रिपोर्ट और हालिया घटनाएं यह दिखाती हैं कि दहेज प्रथा केवल ग्रामीण या अशिक्षित समाज तक सीमित नहीं है। शहरी और पेशेवर महिलाएं भी इसके दायरे में आ रही हैं। कई मामलों में महिलाएं घरेलू हिंसा और दबाव के कारण समय पर शिकायत नहीं कर पातीं।
सामाजिक और मानसिक दबाव बड़ी वजह
विशेषज्ञों के अनुसार दहेज केवल आर्थिक लेन-देन नहीं बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और पितृसत्तात्मक सोच से जुड़ा मुद्दा है। शादी और परिवार की इज्जत के दबाव में कई बार पीड़ित महिलाएं चुप रह जाती हैं, जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है।
कानून के बावजूद क्यों जारी है समस्या?
हालांकि दहेज निषेध कानून मौजूद है, लेकिन प्रभावी क्रियान्वयन, शिकायत प्रणाली और सामाजिक जागरूकता की कमी के कारण यह समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है। समाज में सोच बदलने और महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ाने को इसका स्थायी समाधान माना जा रहा है।
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