वाराणसी | अंतर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (IRRI) के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र (आइसार्क) ने हिमाचल प्रदेश के कृषि विभाग के सहयोग से 16 से 19 अप्रैल के बीच मंडी और कांगड़ा जिलों में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बहु-स्थानीय किसान प्रशिक्षण कार्यशालाओं और क्षेत्र भ्रमण कार्यक्रमों का सफल आयोजन किया।

टिकाऊ और जलवायु-सुदृढ़ खेती की तकनीकों से परिचित कराना मुख्य उद्देश्य

इस पहल का मुख्य उद्देश्य बढ़ती कृषि लागत और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच किसानों को कम लागत वाली, टिकाऊ और जलवायु-सुदृढ़ खेती की तकनीकों से परिचित कराना रहा। कार्यक्रम के तहत महादेव पंचायत (मंडी), पपरौला फार्म और भट्टू फार्म (कांगड़ा) में आयोजित प्रशिक्षण सत्रों में 200 से अधिक किसानों ने सक्रिय भागीदारी की।

अधिकारियों ने भी कार्यक्रम में भाग लेकर साझा किए अपने अनुभव

प्रशिक्षण सत्रों का संचालन इरी के विशेषज्ञों—डॉ. अजय कुमार मिश्रा, डॉ. श्रीनिवास रेड्डी और डॉ. गायत्री हेट्टा—द्वारा किया गया, जिन्हें कृषि क्षेत्र के तकनीशियनों का सहयोग प्राप्त हुआ। इस दौरान कृषि विभाग एवं कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन अभिकरण (आत्मा) के अधिकारियों ने भी कार्यक्रम में भाग लेकर   साझा किए।

विशेषज्ञों ने प्राकृतिक खेती के महत्व पर डाला प्रकाश

कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने प्राकृतिक खेती के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह पद्धति रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता और दीर्घकालिक उत्पादकता को बेहतर बनाती है। प्रशिक्षण में संवादात्मक सत्रों के साथ-साथ प्राकृतिक खेती में उपयोग होने वाले जैविक आदानों की तैयारी और उनके उपयोग का व्यावहारिक प्रदर्शन भी किया गया।

कम लागत, बेहतर मिट्टी स्वास्थ्य तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे लाभ

इसके अतिरिक्त, क्षेत्र भ्रमण के माध्यम से किसानों को वास्तविक परिस्थितियों में इन तकनीकों को समझने और देखने का अवसर मिला। किसानों ने प्राकृतिक खेती के प्रति गहरी रुचि दिखाई और कम लागत, बेहतर मिट्टी स्वास्थ्य तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे लाभों को सराहा।

प्राकृतिक खेती को अपनाने में महत्वपूर्ण भूमिका

यह पहल किसानों के बीच प्राकृतिक और टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति बढ़ती जागरूकता और रुचि को दर्शाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे क्षमता निर्माण कार्यक्रम भविष्य में व्यापक स्तर पर प्राकृतिक खेती को अपनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे, जिससे कृषि क्षेत्र अधिक सशक्त और पर्यावरण अनुकूल बन सकेगा।

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