Khabarilaal News Desk :
नीट (NEET) की तैयारी कर रही छात्रा आकांक्षा चतुर्वेदी की कथित आत्महत्या के मामले ने एक बार फिर देश की शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले को लेकर कांग्रेस सांसद Rahul Gandhi ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है।
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि आकांक्षा की मौत सिर्फ एक आत्महत्या नहीं, बल्कि एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था का परिणाम है, जिसने लाखों छात्रों के भविष्य को अनिश्चितता में धकेल दिया है।
'पिता ने जो कर सकता था, सब किया'
राहुल गांधी ने कहा कि आकांक्षा के पिता एक किसान हैं, जिन्होंने बेटी को डॉक्टर बनाने के सपने के लिए हर संभव प्रयास किया। उन्होंने किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए करीब तीन लाख रुपये का कर्ज लिया और नागपुर में रसोइए का काम तक किया, ताकि बेटी की पढ़ाई और कोचिंग का खर्च उठा सकें।
उन्होंने कहा कि एक पिता ने अपनी जिम्मेदारी निभाने में कोई कमी नहीं छोड़ी, लेकिन परीक्षा प्रणाली से जुड़ी अनिश्चितताओं ने छात्रा को मानसिक रूप से तोड़ दिया।
पेपर लीक के बाद बढ़ी थी निराशा
रिपोर्ट्स के अनुसार, मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले की रहने वाली 18 वर्षीय आकांक्षा चतुर्वेदी नागपुर में रहकर NEET परीक्षा की तैयारी कर रही थीं। परिवार का दावा है कि परीक्षा में धांधली और पेपर लीक की खबरों के बाद वह गहरे तनाव और अवसाद में चली गई थीं।
20 मई को उनका शव नागपुर स्थित कमरे में फंदे से लटका मिला था। बाद में परिवार को एक हस्तलिखित नोट मिला, जिसमें उन्होंने परीक्षा को लेकर अपनी निराशा और मानसिक संघर्ष का जिक्र किया था।
'न सुधार, न न्याय'
राहुल गांधी ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan का नाम लेते हुए कहा कि परीक्षा विवादों के बावजूद व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देता।
उन्होंने आरोप लगाया कि हर विवाद के बाद केवल जांच समितियां बनती हैं, लेकिन छात्रों को न्याय और शिक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं मिल पाता।
परिवार ने उठाया था बड़ा आर्थिक बोझ
आकांक्षा के परिजनों के मुताबिक, उनकी पढ़ाई के लिए परिवार ने आर्थिक कठिनाइयों का सामना किया। खेती से सीमित आय होने के बावजूद पिता ने कर्ज लिया और अतिरिक्त काम करके बेटी की पढ़ाई जारी रखी।
परिवार और रिश्तेदारों का कहना है कि आकांक्षा डॉक्टर बनकर परिवार और समाज की सेवा करना चाहती थीं, लेकिन परीक्षा को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता ने उन्हें मानसिक रूप से प्रभावित किया।
शिक्षा व्यवस्था पर फिर उठे सवाल
इस घटना के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, छात्रों पर बढ़ते मानसिक दबाव और परीक्षा प्रणाली में सुधार की जरूरत को लेकर बहस तेज हो गई है। छात्र संगठनों और विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी परीक्षा प्रक्रिया को अधिक भरोसेमंद और पारदर्शी बनाने की मांग दोहराई है।
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