WORLD NEWS - लाखों साल पुरानी चट्टानों ने खोला राज: कैसे अलग हुए भारत और अंटार्कटिका
Khabarilaal News Desk :
वैज्ञानिकों की एक नई स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि लाखों-करोड़ों साल पहले भारत और अंटार्कटिका एक ही विशाल भूभाग का हिस्सा थे। शोधकर्ताओं के अनुसार, दोनों महाद्वीपों के बीच प्राचीन समय में गहरा भूवैज्ञानिक संबंध था, जिसे आज की चट्टानों के अध्ययन से समझा जा रहा है।
आंध्र प्रदेश और अंटार्कटिका की चट्टानों में समानता
रिपोर्ट के मुताबिक, आंध्र प्रदेश के विजयनगरम और सालूर क्षेत्र की चट्टानों की तुलना पूर्वी अंटार्कटिका की चट्टानों से की गई। अध्ययन में पाया गया कि दोनों क्षेत्रों की चट्टानों की उम्र, खनिज संरचना और रासायनिक विशेषताएं काफी हद तक समान हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह समानता इस बात का मजबूत प्रमाण है कि दोनों क्षेत्र कभी एक ही भूवैज्ञानिक प्रणाली का हिस्सा थे।
पुरानी चट्टानों में छिपा इतिहास
शोध में जिरकॉन, गार्नेट और मोनाजाइट जैसे खनिजों का विश्लेषण किया गया। जिरकॉन क्रिस्टल को एक “प्राकृतिक टाइम कैप्सूल” माना जाता है, जो करोड़ों साल पुरानी भूगर्भीय घटनाओं की जानकारी सुरक्षित रखता है।
इन खनिजों के अध्ययन से पता चला कि दोनों क्षेत्रों में तीन प्रमुख भूवैज्ञानिक चरण समान रूप से दर्ज हैं, जो प्राचीन समय में बड़े टेक्टोनिक बदलावों की ओर इशारा करते हैं।
कब हुआ था बदलाव?
अध्ययन के अनुसार, पहला प्रमुख भूवैज्ञानिक चरण लगभग 1000 से 990 मिलियन वर्ष पहले हुआ था, जब एक बड़े महाद्वीपीय टकराव से विशाल पर्वत श्रृंखलाएं बनीं।
इसके बाद 950 से 890 मिलियन वर्ष के बीच और फिर 570 से 540 मिलियन वर्ष पहले चट्टानों में महत्वपूर्ण परिवर्तन और रासायनिक प्रक्रियाएं हुईं, जिनके निशान आज भी मौजूद हैं।
गोंडवाना सुपरकॉन्टिनेंट का टूटना
वैज्ञानिकों का मानना है कि भारत और अंटार्कटिका दोनों पहले सुपरकॉन्टिनेंट गोंडवाना का हिस्सा थे। लगभग 130 से 150 मिलियन वर्ष पहले गोंडवाना के टूटने की प्रक्रिया शुरू हुई, जिसके बाद भारत उत्तर की ओर और अंटार्कटिका दक्षिण की ओर खिसक गया।
इसी भूगर्भीय बदलाव के कारण दोनों महाद्वीप आज हजारों किलोमीटर दूर हैं, लेकिन उनकी चट्टानें अब भी साझा इतिहास की गवाही देती हैं।
वैज्ञानिकों के लिए अहम खोज
विशेषज्ञों का कहना है कि यह अध्ययन न केवल भारत की भूगर्भीय इतिहास को समझने में मदद करता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि पृथ्वी के महाद्वीप समय के साथ लगातार बदलते रहे हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह खोज भविष्य में और गहराई से पृथ्वी की संरचना समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
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