Khabarilaal News Desk :
नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों द्वारा एक अपेक्षाकृत कम चर्चित राजनीतिक दल नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय किए जाने के बाद देश में एक बार फिर दलबदल विरोधी कानून चर्चा के केंद्र में आ गया है। राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या सांसदों का समूह किसी दूसरी पार्टी में शामिल होकर अपनी सदस्यता बचा सकता है और आखिर संविधान इस बारे में क्या कहता है।
क्या है दलबदल विरोधी कानून?
भारत में दलबदल विरोधी कानून वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए लागू किया गया था। इसे संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) में शामिल किया गया।
इस कानून का उद्देश्य चुने हुए जनप्रतिनिधियों द्वारा व्यक्तिगत लाभ या सत्ता परिवर्तन के लिए बार-बार पार्टी बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना था।
कब जाती है सांसद या विधायक की सदस्यता?
दसवीं अनुसूची के अनुसार:
- यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है।
- या सदन में पार्टी के व्हिप के खिलाफ मतदान करता है।
- या पार्टी लाइन के विपरीत कार्य करता है।
तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है।
कब नहीं लागू होती अयोग्यता?
दलबदल कानून में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है।
यदि:
- किसी राजनीतिक दल का दूसरी पार्टी में विलय हो जाए।
- और उस दल के कम से कम दो-तिहाई सांसद या विधायक इस विलय का समर्थन करें।
तो ऐसे सदस्यों पर अयोग्यता लागू नहीं होगी।
यही कारण है कि TMC सांसदों के इस कदम को दलबदल कानून से बचने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
2003 में खत्म हुआ था ‘एक तिहाई’ वाला नियम
शुरुआत में यदि किसी दल के एक-तिहाई विधायक या सांसद अलग हो जाते थे तो उसे "स्प्लिट" माना जाता था और सदस्यता नहीं जाती थी।
लेकिन वर्ष 2003 में 91वें संविधान संशोधन के जरिए यह प्रावधान समाप्त कर दिया गया। अब केवल दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन वाला "विलय" ही मान्य है।
TMC संकट की पूरी कहानी
पश्चिम बंगाल में राजनीतिक परिस्थितियों के बीच TMC के भीतर असंतोष बढ़ा और पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने बगावत का रास्ता अपनाया।
बागी खेमे में शामिल प्रमुख नामों में:
- काकोली घोष दस्तीदार
- सुदीप बंदोपाध्याय
- शताब्दी रॉय
- यूसुफ पठान
- प्रसून बनर्जी
जैसे नेता शामिल बताए जा रहे हैं।
क्या होगा राजनीतिक असर?
यदि यह विलय संवैधानिक रूप से वैध माना जाता है तो:
- लोकसभा में TMC की संख्या में भारी गिरावट आ सकती है।
- सत्तारूढ़ गठबंधन की ताकत बढ़ सकती है।
- दलबदल कानून की व्याख्या को लेकर नया संवैधानिक विवाद खड़ा हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका होगी अहम
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि असली प्रश्न यह है कि क्या केवल सांसदों का समूह विलय की घोषणा कर सकता है या मूल राजनीतिक दल की भी औपचारिक सहमति आवश्यक है।
इस मुद्दे पर अंतिम व्याख्या और स्पष्टता भविष्य में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से ही सामने आ सकती है।
क्या है निष्कर्ष?
दलबदल विरोधी कानून का मूल उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना है, लेकिन समय-समय पर सांसदों और विधायकों द्वारा अपनाए गए नए राजनीतिक रास्तों ने इसकी व्याख्या को और जटिल बना दिया है। TMC सांसदों का NCPI में विलय इसी बहस का नया अध्याय बन गया है।
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