Khabarilaal News Desk :

नई दिल्ली। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि घर छोड़कर साथ रहने का फैसला कई बार परिवार की प्रतिष्ठा और सामाजिक सम्मान को प्रभावित कर सकता है। अदालत ने एक युवा जोड़े की पुलिस सुरक्षा संबंधी याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

मामले में एक युवक और युवती ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दावा किया था कि वे अपनी इच्छा से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं और उन्हें परिवार से खतरा है। इसी आधार पर उन्होंने पुलिस सुरक्षा की मांग की थी।

क्या था मामला?

याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि वे दोनों बालिग हैं, एक-दूसरे से प्रेम करते हैं और भविष्य में विवाह करना चाहते हैं। वर्तमान में वे साथ रह रहे हैं और परिवार के विरोध के चलते उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता है।

उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संदीप मौदगिल ने कहा कि आजकल कई युवक-युवतियां घर छोड़कर लिव-इन रिलेशनशिप में रहने लगते हैं, जिससे माता-पिता और परिवार को सामाजिक व भावनात्मक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

अदालत ने कहा कि माता-पिता अपने बच्चों से कई उम्मीदें रखते हैं और ऐसे कदमों से परिवार की प्रतिष्ठा प्रभावित हो सकती है। हालांकि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल सामाजिक या नैतिक आधार पर किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों को नकारा नहीं जा सकता।

क्यों खारिज हुई याचिका?

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल कुछ दिन साथ रहने भर से किसी संबंध को पूर्ण लिव-इन रिलेशनशिप नहीं माना जा सकता, विशेषकर तब जब दोनों पक्ष स्वयं स्वीकार कर रहे हों कि उनका उद्देश्य भविष्य में विवाह करना है।

अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे हालात में पुलिस सुरक्षा प्रदान करना अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे संबंध को न्यायिक स्वीकृति देने जैसा होगा। इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई।

कानून क्या कहता है?

भारतीय संविधान प्रत्येक बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद से जीवन जीने और साथी चुनने का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट भी कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि दो बालिग व्यक्ति अपनी इच्छा से साथ रह सकते हैं।

हालांकि अदालतें प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेती हैं। किसी संबंध को "शादी जैसा रिश्ता" मानने के लिए उसकी अवधि, स्थायित्व और परिस्थितियों का भी मूल्यांकन किया जाता है।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारिवारिक मूल्यों के बीच संतुलन

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारिवारिक मूल्यों के बीच संतुलन की बहस को एक बार फिर सामने लाता है। अदालत ने जहां संवैधानिक अधिकारों को महत्वपूर्ण माना, वहीं परिवार और समाज पर पड़ने वाले प्रभावों को भी नजरअंदाज नहीं किया।

BUREAU : CHANDAN KUMAR

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