Khabarilaal News Desk :

कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भारत ने एक बार फिर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। चीन में भारत के राजदूत विक्रम दोराईस्वामी ने तिब्बत दौरे के दौरान बताया कि इस वर्ष श्रद्धालु सिक्किम के नाथुला दर्रे के साथ-साथ उत्तराखंड के लिपुलेख पास के रास्ते भी कैलाश मानसरोवर यात्रा कर सकेंगे। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब नेपाल लगातार लिपुलेख मार्ग को लेकर आपत्ति जता रहा है।

तिब्बत पहुंचकर तैयारियों का लिया जायजा

भारतीय राजदूत विक्रम दोराईस्वामी ने तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र का दौरा कर कैलाश मानसरोवर यात्रा की तैयारियों की समीक्षा की। उन्होंने स्थानीय चीनी अधिकारियों के साथ यात्रा मार्ग, सुरक्षा व्यवस्था, बुनियादी ढांचे और श्रद्धालुओं की सुविधाओं का निरीक्षण किया। यह तिब्बत क्षेत्र में उनका पहला बड़ा आधिकारिक दौरा माना जा रहा है।

कैलाश पर्वत की परिक्रमा के बाद दिया संदेश

माउंट कैलाश की परिक्रमा पूरी करने के बाद जारी वीडियो संदेश में दोराईस्वामी ने कहा कि उन्होंने न केवल कैलाश पर्वत की परिक्रमा की, बल्कि भारत से तिब्बत में प्रवेश करने वाले प्रमुख मार्गों का भी निरीक्षण किया है। उन्होंने कहा कि नाथुला और लिपुलेख दोनों मार्गों से आने वाले यात्रियों के लिए व्यवस्थाएं सुनिश्चित की जा रही हैं।

नेपाल की आपत्ति के बावजूद कायम भारत का रुख

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित लिपुलेख दर्रा वर्षों से कैलाश मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक मार्ग रहा है। हालांकि नेपाल इस क्षेत्र पर दावा करता है और भारत-चीन द्वारा इस मार्ग के उपयोग पर आपत्ति जताता रहा है। हाल ही में नेपाल ने दोनों देशों को आधिकारिक नोट भेजकर विरोध दर्ज कराया था।

इसके बावजूद भारत ने साफ किया है कि लिपुलेख भारत का हिस्सा है और एकतरफा दावे से वास्तविक स्थिति नहीं बदलती। विदेश मंत्रालय पहले भी कह चुका है कि सीमा विवादों के समाधान के लिए दोनों देशों के बीच स्थापित तंत्र मौजूद हैं।

श्रद्धालुओं के लिए राहत भरी खबर

लंबे समय बाद फिर से नियमित रूप से शुरू हो रही कैलाश मानसरोवर यात्रा में इस बार दो प्रमुख मार्ग उपलब्ध होंगे। इससे यात्रियों को अधिक विकल्प मिलेंगे और यात्रा प्रबंधन भी बेहतर तरीके से किया जा सकेगा। धार्मिक महत्व की इस यात्रा को लेकर भारत और चीन दोनों स्तरों पर तैयारियां तेज कर चुके हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है लिपुलेख मार्ग?

लिपुलेख दर्रा भारत से तिब्बत जाने वाले सबसे पुराने और सुविधाजनक मार्गों में शामिल है। कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए इसे पारंपरिक प्रवेश द्वार माना जाता है। कम दूरी और बेहतर पहुंच के कारण बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसी मार्ग को प्राथमिकता देते हैं।

भारत-नेपाल सीमा विवाद के बीच बढ़ा महत्व

विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय राजदूत का यह बयान केवल यात्रा से जुड़ा संदेश नहीं बल्कि एक कूटनीतिक संकेत भी है। इससे साफ है कि भारत लिपुलेख को लेकर अपने रुख में कोई बदलाव करने के मूड में नहीं है और कैलाश मानसरोवर यात्रा पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार ही संचालित होगी।

BUREAU : CHANDAN KUMAR

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