Khabarilaal News Desk :
नई दिल्ली। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ को मासिक धर्म और पूजा-अर्चना से संबंधित एक सार्वजनिक टिप्पणी के बाद कानूनी विवाद का सामना करना पड़ रहा है। मुंबई के अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय ने उन्हें कानूनी नोटिस भेजते हुए आरोप लगाया है कि उनके बयान से सनातन धर्म की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं।
क्या है पूरा मामला?
पूर्व CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ ने 28 मई को आयोजित एक कार्यक्रम में अपने परिवार से जुड़ा एक प्रसंग साझा करते हुए कहा था कि मासिक धर्म किसी महिला को अशुद्ध नहीं बनाता और महिलाएं इस दौरान भी पूजा-अर्चना में भाग ले सकती हैं।
उनके इस बयान के बाद अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय ने आपत्ति जताते हुए कानूनी नोटिस भेजा है। नोटिस में कहा गया है कि यह टिप्पणी सनातन धर्म की पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं और प्रथाओं के विपरीत है।
नोटिस में लगाए गए प्रमुख आरोप
नोटिस में कहा गया है कि:
-
पूर्व CJI ने अपने निजी अनुभव को सार्वजनिक मंच पर इस प्रकार प्रस्तुत किया जिससे सनातन धर्म की धार्मिक परंपराओं को चुनौती मिली।
-
मासिक धर्म के दौरान कुछ धार्मिक प्रतिबंध हिंदू परंपराओं का हिस्सा हैं और उन्हें सामाजिक भेदभाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
-
उनकी टिप्पणी से करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाएं प्रभावित हुई हैं।
-
उनसे सार्वजनिक स्पष्टीकरण और बिना शर्त माफी की मांग की गई है।
सबरीमाला विवाद का भी उल्लेख
नोटिस में सबरीमाला मंदिर प्रवेश मामले का भी जिक्र किया गया है, जहां महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक परंपराओं को लेकर संवैधानिक बहस पहले से चल चुकी है। नोटिस में पूछा गया है कि क्या इस प्रकार की टिप्पणी किसी लंबित धार्मिक विवाद को प्रभावित करने का प्रयास है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता पर बहस
यह मामला केवल एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर नई बहस को जन्म दे रहा है।
पूर्व CJI चंद्रचूड़ अपने कई न्यायिक फैसलों में महिलाओं के अधिकारों, लैंगिक समानता और मासिक धर्म स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों के समर्थन में स्पष्ट रुख रखते रहे हैं। उनकी अध्यक्षता वाली पीठ ने मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमामय जीवन के अधिकार से भी जोड़ा था।
क्या हो सकता है अगला कदम?
कानूनी नोटिस का जवाब निर्धारित समय सीमा के भीतर देना होता है। यदि नोटिस भेजने वाले पक्ष को संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, तो वह आगे कानूनी कार्रवाई करने का निर्णय ले सकता है।
फिलहाल पूर्व CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ की ओर से इस नोटिस पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, यह मामला आने वाले दिनों में धार्मिक परंपराओं, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक सुधारों को लेकर व्यापक राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन सकता है।
Comments (0)