Khabrilaal News Desk :
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में शनिवार को एक गरिमामयी समारोह के दौरान प्राकृत विभाग के आचार्य एवं पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. हरिशंकर पाण्डेय द्वारा रचित दो महत्वपूर्ण ग्रंथों “प्राच्य अध्ययन में अहिंसा” और “चिन्मय गुरुदेव” का भव्य लोकार्पण किया गया। यह लोकार्पण कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा के करकमलों द्वारा सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में विद्वानों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
कुलपति ने बताया ज्ञान परम्परा का दीपस्तम्भ
लोकार्पण के बाद कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि ये दोनों ग्रंथ भारतीय ज्ञान परम्परा के उज्ज्वल दीपस्तम्भ हैं। उन्होंने कहा कि ये कृतियाँ केवल पुस्तकें नहीं, बल्कि शांति, सहअस्तित्व और अध्यात्म का वैश्विक संदेश देने वाली महत्वपूर्ण धरोहर हैं।
अहिंसा पर आधारित ग्रंथ की विशेष सराहना
कुलपति ने “प्राच्य अध्ययन में अहिंसा” ग्रंथ की विशेष प्रशंसा करते हुए कहा कि इसमें संस्कृत, प्राकृत और पालि वाङ्मय के माध्यम से अहिंसा के सार्वभौमिक स्वरूप को अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जो विश्व समुदाय के लिए भारत का शाश्वत संदेश बन सकता है।
‘चिन्मय गुरुदेव’ में गुरुतत्त्व का गूढ़ विश्लेषण
“चिन्मय गुरुदेव” ग्रंथ पर अपने विचार रखते हुए कुलपति ने कहा कि इसमें गुरुतत्त्व के गूढ़ विषयों से लेकर जैन परम्परा की प्रज्ञा तक को अत्यंत सारगर्भित रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह ग्रंथ ‘गागर में सागर’ की कहावत को साकार करता है।
भारतीय ज्ञान परम्परा के प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
कुलसचिव राकेश कुमार और प्रो. रमेश प्रसाद ने भी ग्रंथों की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए इसे भारतीय ज्ञान परम्परा के पुनरुत्थान और वैश्विक प्रसार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
ग्रंथकार ने गुरुओं को दिया श्रेय
अपने संबोधन में प्रो. हरिशंकर पाण्डेय ने इस उपलब्धि का श्रेय अपने गुरुओं और माता-पिता को देते हुए कहा कि उनका उद्देश्य भारतीय ज्ञान परम्परा को सरल और सुबोध भाषा में नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।
कार्यक्रम में विद्वानों की रही उपस्थिति
इस अवसर पर कुलसचिव राकेश कुमार, परीक्षा नियंत्रक दिनेश कुमार, प्रो. रमेश प्रसाद, डॉ. रविशंकर पाण्डेय सहित विभिन्न विभागों के आचार्य, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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