Khabarilaal News Desk :
रूस और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ते तनाव के बीच फिनलैंड ने अपनी सुरक्षा नीति में ऐतिहासिक बदलाव करते हुए परमाणु हथियारों पर लगे दशकों पुराने प्रतिबंध को हटाने का फैसला किया है। फिनलैंड की संसद द्वारा कानून में संशोधन को मंजूरी मिलने के बाद अब देश अपनी धरती पर परमाणु हथियारों की तैनाती और NATO की न्यूक्लियर रणनीति का हिस्सा बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
इस फैसले को रूस के लिए एक नई रणनीतिक चुनौती माना जा रहा है क्योंकि फिनलैंड की रूस के साथ 1,300 किलोमीटर से अधिक लंबी सीमा लगती है।
NATO में शामिल होने के बाद बदली सुरक्षा रणनीति
अप्रैल 2023 में NATO का सदस्य बनने के बाद फिनलैंड लगातार अपनी सैन्य और सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने में जुटा हुआ है।
अब संसद द्वारा परमाणु हथियारों से जुड़े प्रतिबंध हटाने के बाद देश की सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। फिनलैंड सरकार का कहना है कि बदलते सुरक्षा हालात और क्षेत्रीय खतरों को देखते हुए यह कदम आवश्यक है।
F-35 लड़ाकू विमानों के साथ बढ़ सकती है परमाणु क्षमता
फिनलैंड पहले ही अमेरिका से 64 अत्याधुनिक F-35A स्टील्थ फाइटर जेट खरीद चुका है।
F-35A उन चुनिंदा लड़ाकू विमानों में शामिल है जिन्हें परमाणु हथियार ले जाने और लॉन्च करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में फिनलैंड की धरती पर अमेरिकी B61 श्रृंखला के परमाणु बम तैनात किए जा सकते हैं।
जरूरत पड़ने पर इन हथियारों को F-35 विमान के जरिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
अमेरिका के साथ न्यूक्लियर शेयरिंग समझौते की संभावना
NATO के कई देशों के साथ अमेरिका पहले से न्यूक्लियर शेयरिंग व्यवस्था लागू कर चुका है।
जर्मनी, बेल्जियम, नीदरलैंड, इटली और तुर्किये जैसे देशों में अमेरिकी परमाणु हथियार मौजूद हैं। अब फिनलैंड को भी इस व्यवस्था का संभावित भागीदार माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में फिनलैंड और अमेरिका के बीच इस दिशा में औपचारिक समझौता हो सकता है।
फ्रांस के साथ भी बढ़ सकता है परमाणु सहयोग
फिनलैंड केवल अमेरिका ही नहीं बल्कि फ्रांस के साथ भी रक्षा और परमाणु सहयोग बढ़ाने पर विचार कर रहा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक फ्रांस के परमाणु हथियारों से लैस राफेल लड़ाकू विमानों की फिनलैंड में तैनाती की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई है।
फिनलैंड के प्रधानमंत्री पेटेरी ओर्पो पहले इस संभावना का सार्वजनिक रूप से उल्लेख कर चुके हैं।
रूस के लिए क्यों बढ़ सकती है चिंता?
फिनलैंड की भौगोलिक स्थिति रूस के लिए बेहद संवेदनशील मानी जाती है।
रूस के कई महत्वपूर्ण सैन्य और औद्योगिक केंद्र फिनलैंड की सीमा के करीब स्थित हैं। ऐसे में यदि फिनलैंड में न्यूक्लियर हथियारों से लैस F-35 या अन्य लड़ाकू विमान तैनात होते हैं तो इसका सीधा असर रूस की सुरक्षा रणनीति पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार स्टील्थ तकनीक से लैस F-35 रूस की वायु रक्षा प्रणाली के लिए भी बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
रूस ने पहले ही दी है चेतावनी
रूस पहले ही फिनलैंड के NATO में शामिल होने पर कड़ी प्रतिक्रिया दे चुका है।
मॉस्को ने साफ कहा है कि यदि उसकी सुरक्षा को खतरा महसूस हुआ तो वह जवाबी सैन्य कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।
रूसी अधिकारियों का मानना है कि NATO का विस्तार यूरोप में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर रहा है।
अमेरिका-फिनलैंड रक्षा समझौता बदल सकता है समीकरण
फिनलैंड और अमेरिका के बीच डिफेंस कोऑपरेशन एग्रीमेंट (DCA) पर भी काम चल रहा है।
इस समझौते के लागू होने के बाद अमेरिकी सेना को फिनलैंड में सैन्य ढांचा विकसित करने, एयरबेस उपयोग करने और रणनीतिक तैनाती की अतिरिक्त सुविधाएं मिल सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे फिनलैंड NATO के सबसे महत्वपूर्ण उत्तरी सैन्य केंद्रों में शामिल हो सकता है।
यूरोप की सुरक्षा राजनीति में बड़ा बदलाव
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप के कई देशों ने अपनी रक्षा नीति और सैन्य खर्च में तेजी से बढ़ोतरी की है।
फिनलैंड का यह फैसला भी उसी व्यापक रणनीतिक बदलाव का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें यूरोपीय देश अपनी सुरक्षा क्षमताओं को पहले से अधिक मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
आने वाले समय में फिनलैंड की नई न्यूक्लियर नीति यूरोप की सुरक्षा राजनीति और रूस-NATO संबंधों पर बड़ा प्रभाव डाल सकती है।
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