Khabarilaal News Desk :
रंगून/नई दिल्ली। भारत के पड़ोसी देश म्यांमार की सैन्य गतिविधियों को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है। हाल ही में सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों से संकेत मिले हैं कि म्यांमार स्वदेशी अटैक सबमरीन (हमलावर पनडुब्बी) का निर्माण कर रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना उत्तर कोरिया की तकनीकी सहायता से आगे बढ़ रही है। यदि यह आकलन सही साबित होता है तो भारत के पूर्वी समुद्री क्षेत्र में रणनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।
सैटेलाइट तस्वीरों से हुआ बड़ा खुलासा
रक्षा विश्लेषकों द्वारा जारी सैटेलाइट इमेजरी में म्यांमार के एक शिपयार्ड में लगभग 40 मीटर लंबी पनडुब्बी जैसी संरचना दिखाई दी है। प्रारंभिक विश्लेषण के अनुसार इसका डिजाइन उत्तर कोरिया की प्रसिद्ध ‘सांग-ओ क्लास’ पनडुब्बियों से काफी मिलता-जुलता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि म्यांमार कई वर्षों से अपनी नौसैनिक ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और यह परियोजना उसी रणनीति का हिस्सा हो सकती है।
उत्तर कोरिया और म्यांमार के पुराने सैन्य संबंध
म्यांमार और उत्तर कोरिया के बीच रक्षा सहयोग कोई नई बात नहीं है। दोनों देशों के बीच कई दशकों से सैन्य संबंध रहे हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक म्यांमार लंबे समय से उत्तर कोरियाई हथियारों और सैन्य उपकरणों का खरीदार रहा है। यही कारण है कि नई पनडुब्बी परियोजना में उत्तर कोरियाई तकनीक के इस्तेमाल की संभावना मजबूत मानी जा रही है।
क्या है सांग-ओ क्लास पनडुब्बी?
सांग-ओ क्लास (Sang-O Class) उत्तर कोरियाई नौसेना की सबसे महत्वपूर्ण डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों में गिनी जाती है। इसे विशेष रूप से तटीय और उथले समुद्री क्षेत्रों में ऑपरेशन के लिए विकसित किया गया था।
यह पनडुब्बी दुश्मन के युद्धपोतों पर अचानक हमला करने, समुद्री सुरंगें (माइंस) बिछाने और विशेष सैन्य अभियानों को अंजाम देने में सक्षम मानी जाती है।
अमेरिकी युद्धपोतों को चुनौती देने का दावा
उत्तर कोरिया दावा करता रहा है कि उसकी सांग-ओ क्लास पनडुब्बियों ने सैन्य अभ्यासों के दौरान अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर और परमाणु पनडुब्बियों को निशाना बनाने में सफलता हासिल की है।
हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सैन्य विशेषज्ञ मानते हैं कि यह प्लेटफॉर्म कम लागत में प्रभावी समुद्री युद्ध क्षमता प्रदान करता है।
म्यांमार को मिल सकती है नई समुद्री ताकत
रक्षा विश्लेषकों के अनुसार यदि म्यांमार इस पनडुब्बी को सफलतापूर्वक विकसित कर लेता है तो उसकी नौसेना की क्षमता में बड़ा इजाफा होगा।
संभावना जताई जा रही है कि भविष्य में इसमें आधुनिक टॉरपीडो सिस्टम, एंटी-शिप मिसाइलें और यहां तक कि क्रूज मिसाइल लॉन्च करने की क्षमता भी जोड़ी जा सकती है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह घटनाक्रम?
भारत की पूर्वी समुद्री सीमा और बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में म्यांमार का विशेष रणनीतिक महत्व है। ऐसे में उत्तर कोरिया समर्थित किसी सैन्य परियोजना का विकास भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी में रहेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम हिंद महासागर क्षेत्र में बदलते सैन्य संतुलन और उत्तर कोरिया की बढ़ती तकनीकी पहुंच का संकेत भी हो सकता है।
क्षेत्रीय सुरक्षा पर बढ़ सकती है नजर
म्यांमार पहले से ही राजनीतिक अस्थिरता और गृहयुद्ध जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में पनडुब्बी निर्माण जैसी परियोजना यह दर्शाती है कि सैन्य नेतृत्व अपनी समुद्री शक्ति को प्राथमिकता दे रहा है।
आने वाले समय में इस परियोजना की प्रगति पर भारत सहित पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की नजर बनी रहेगी।
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