भारत लंबे समय से वैश्विक स्तर पर “विश्व की फ़ार्मेसी” के रूप में जाना जाता रहा है, जिसका प्रमुख कारण जेनरिक दवाओं के उत्पादन में उसकी अग्रणी भूमिका रही है। हालांकि, बदलते वैश्विक औषधि परिदृश्य और बढ़ती तकनीकी आवश्यकताओं के बीच, भारत अब एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है—जहाँ ध्यान केवल पैमाने (Scale) पर नहीं, बल्कि नवाचार (Innovation) पर केंद्रित है।

वैश्विक औषधि उद्योग में बायोलॉजिक, बायोसिमिलर और विशेष दवाओं की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक

वैश्विक औषधि उद्योग में बायोलॉजिक, बायोसिमिलर और विशेष दवाओं की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है। यह परिवर्तन इस बात का संकेत है कि भविष्य की चिकित्सा प्रणाली उच्च-मूल्य, अनुसंधान-आधारित और उन्नत तकनीकों पर आधारित होगी। इसी दिशा में भारत ने अपनी रणनीति को पुनर्परिभाषित किया है||स्टार्टअप समर्थन कार्यक्रमों और उद्योग-अकादमिक सहयोग को सुदृढ़ करने वाली नीतियों के साथ मिलकर एक सशक्त नवाचार इकोसिस्टम तैयार कर रहा है

एंटीबायोटिक्स, वैक्सीन, एंज़ाइम और बायोलॉजिक्स के उत्पादन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका

किण्वन-आधारित निर्माण (Fermentation-based manufacturing) इस रणनीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। एंटीबायोटिक्स, वैक्सीन, एंज़ाइम और बायोलॉजिक्स के उत्पादन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होने के बावजूद, भारत लंबे समय तक इस क्षेत्र में आयात पर निर्भर रहा है। अब सरकार इस क्षेत्र में अवसंरचना विकास, तकनीकी हस्तांतरण और प्रोत्साहनों के माध्यम से आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रही है।

वैश्विक दवा विकास के लिए एक प्रमुख गंतव्य बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण

इसके साथ ही, भारत का नैदानिक अनुसंधान (Clinical Research) क्षेत्र भी तेजी से विस्तार कर रहा है। 1,000 मान्यता प्राप्त नैदानिक परीक्षण केंद्रों की स्थापना का लक्ष्य देश को वैश्विक दवा विकास के लिए एक प्रमुख गंतव्य बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है। कम लागत, कुशल मानव संसाधन और बढ़ती अनुसंधान क्षमताएं भारत को इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त प्रदान करती हैं।

प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के तहत सस्ती और गुणवत्ता युक्त दवाओं की उपलब्धता

पिछले वर्षों में उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) और बल्क ड्रग पार्क योजनाओं के माध्यम से सक्रिय औषधि सामग्री (API) और प्रमुख कच्चे माल के घरेलू उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इससे न केवल आयात निर्भरता कम हुई है, बल्कि दवाओं की कीमतों को भी किफायती बनाए रखने में मदद मिली है। प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के तहत सस्ती और गुणवत्ता युक्त दवाओं की उपलब्धता ने स्वास्थ्य सेवाओं को आम जनता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

 

हालांकि, इस परिवर्तन के मार्ग में कुछ चुनौतियां भी हैं, जिनमें अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश की कमी प्रमुख है। इसे दूर करने के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी को मजबूत करना आवश्यक होगा, ताकि दीर्घकालिक नवाचार को निरंतर गति मिल सके।

आने वाले वर्षों में और विस्तार की संभावना

भारत का औषधि बाजार, जिसका मूल्य पहले ही ₹4 लाख करोड़ से अधिक है, आने वाले वर्षों में और विस्तार की संभावना रखता है। यदि वर्तमान नीतिगत समर्थन, तकनीकी नवाचार और बाजार की मांग के बीच संतुलन बना रहता है, तो भारत न केवल जेनरिक दवाओं में, बल्कि नवाचार-आधारित चिकित्सा में भी वैश्विक नेतृत्व स्थापित कर सकता है।

निष्कर्ष

भारत का औषधि क्षेत्र एक महत्वपूर्ण संक्रमण काल से गुजर रहा है। यह बदलाव केवल उत्पादन क्षमता तक सीमित नहीं है, बल्कि ज्ञान, अनुसंधान और तकनीकी उत्कृष्टता की ओर एक व्यापक परिवर्तन का संकेत है। बायोफार्मा शक्ति जैसी पहलों, मजबूत अनुसंधान अवसंरचना और नीति-समर्थन के माध्यम से भारत एक नए युग की ओर अग्रसर है—जहाँ वह वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था में एक नवोन्मेषी और प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभरेगा।

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