Khabarilaal News Desk :

भारत की वायुसेना की ताकत माने जाने वाले Su-30MKI लड़ाकू विमानों की कहानी सिर्फ एक डिफेंस डील नहीं, बल्कि भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी का अहम अध्याय है। 1990 के दशक में जब सोवियत संघ टूट चुका था और रूस आर्थिक संकट से जूझ रहा था, तब उसकी एविएशन इंडस्ट्री लगभग ठप पड़ गई थी।

रूस के लिए मुश्किल दौर, भारत बना सहारा

सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस की रक्षा उत्पादन क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई थी। न तो घरेलू ऑर्डर मिल रहे थे और न ही विदेशी मांग। इसी समय भारत ने रूस के साथ Su-30 फाइटर जेट को लेकर बातचीत शुरू की।

1994 में शुरू हुई बातचीत

1994 में भारतीय रक्षा प्रतिनिधिमंडल ने रूस के इरकुट (Irkutsk) प्लांट में Su-30 की पहली झलक देखी। इसके बाद करीब दो साल तक मूल्यांकन और बातचीत चली, जिसमें विमान की क्षमता और अपग्रेड की संभावनाओं का आकलन किया गया।

1996 में हुआ बड़ा सौदा

30 नवंबर 1996 को भारत और रूस के बीच लगभग 1.46 अरब डॉलर की डील हुई, जिसके तहत 50 Su-30 विमानों की आपूर्ति तय हुई। यह कोई सीधा खरीद सौदा नहीं था, बल्कि चरणबद्ध अपग्रेड मॉडल पर आधारित था, जिससे विमान की क्षमताओं में लगातार सुधार होता गया।

Su-30MKI कैसे बना

भारत की जरूरतों के अनुसार इस विमान को और उन्नत किया गया और यही आगे चलकर Su-30MKI बना। इसमें भारत, रूस, फ्रांस और इजरायल की तकनीकों का मिश्रण शामिल किया गया, जिससे यह मल्टी-रोल फाइटर जेट बेहद शक्तिशाली बन गया।

भारत में भी हुआ निर्माण

साल 2000 में हुए समझौते के तहत HAL ने 140 विमानों का निर्माण भारत में ही शुरू किया। पहला पूरी तरह तैयार Su-30MKI 2004 में भारतीय वायुसेना में शामिल हुआ।

लगातार अपग्रेड होता रहा फ्लीट

इसके बाद भारत ने अपनी जरूरतों के अनुसार इसमें कई आधुनिक सिस्टम जोड़े, जिससे Su-30MKI आज भी भारतीय वायुसेना की रीढ़ माना जाता है।

DESK REPORTER : CHANDAN KUMAR

Link Copied to Clipboard!

Comments (0)

5 + 9 = ?
No comments yet. Be the first to share your thoughts!